राजनीति की छाप

राजनीति की छाप

By | 2018-04-02T23:46:19+00:00 April 2nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

खोता जा रहा विश्वास
आस नहीं किसी से
कौन खेयेगा देश की नाव ?
प्रशनचिन्ह लगा हर देश वासी के मस्तक पे
चाहे कोई हो पार्टी
सब अपनी अपनी कथा व्यथा सुना
लूट ना चाह रहे वाह वाही
किसी को सुध नहीं की
अपनी पार्टी की भव्यता को दर्शा
दूसरी पार्टी की छवि गिरा रहे
अब ये राजनीति लगती है बाजार जैसी
हर कोई आवाज़ लगा रहा और अपने व्यापार की गुणवक्ता को गा रहा
सब भीड़ का हिस्सा सा लगते है
अब ये राजनीति राजनीति नहीं9
एक दल दल सी लगती है
प्रश्न चिन्ह के साथ???
अब ये राजनीति एक दलदल सी लगती है। … … .. ………

शालिनी जैन

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