हरजाई ख़ुशी (ग़ज़ल)

हरजाई ख़ुशी (ग़ज़ल)

छुपके  नज़रों से  मेरे  गुज़र  जाती  है ,

यह हरजाई ख़ुशी क्यों मुझे तडपाती है .

कोई बेशुमार तो नहीं है मेरी  चाहतें ,

बस थोड़े से अरमान है जो कुचल देती है.

दिखाती तो है  चेहरा अपना कुछ पल के लिए ,

मगर एहसास होने से पहले ही हवा हो जाती है.

दरअसल तकदीर और  ख़ुशी की निभती नहीं,

तभी तो दोनों  एकदूसरे से खफा ही रहती है.

मगर मैं भी क्या करूँ  ,इंसान हूँ न आखिर,

दोनों को मनाने की कोशिश मेरी लगी रहतीहै.

अब तो जिंदगी की शाम होने जा रही है ,

फिर भी   उस हरजाई की जुस्तजू रहती है.

क्या है यह दीवानापन ,या आजार कोई? ,

जो इंसा की सारी तव्वजो  इसी में  लगी रहती है.

 

 

 

 

 

 

 

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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