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कुछ यादें बीते दिनों की

बचपन का एक जमाना
था खुशियों का खजाना
थे सब अपने, न कोई बेगाना
हमारा भी क्या रंग था
अंदाज सबसे अलग था
पल भर का था रूठना औ पल में मान जाना
जो रूठ जाएं, वो प्यार से मनाना
न था कोई शिकवा गिला
हर लफ्ज पे ऐतबार था
हमारा दिल था बच्चा, पर था वो सच्चा
कुछ आश थी कुछ खाश थी
दो दिलों की एक प्यास थी
एक अहसास थे हमारे, यूँ खास थे दिल हमारे
हाँ प्यार था हमें प्यार था
एक दूजे पे ही दिलों जँ निसार था
दिल की चाहतें बेसुमार थी
दुनिया से हटके अंदाज थे निराले
कहते थे फ़क़त हम तुम्हारे हैं
एक दूजे की खुशियों पे जो हारे थे
हम हार के भी न हारे थे
ऐसा था वो जमाना
बचपन का एक जमाना
था खुशियों का खजाना

सुभाष उर्फ सुबोध

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