दूध के धुले लोग … (ग़ज़ल)

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दूध के धुले लोग … (ग़ज़ल)

दूध  के धुले  लोग  कुछ हमसे  अलग होते हैं,

हाँ  !  उनमें सुर -ख्वाब के पर  लगे होते हैं .

रहते  हैं आसमां में ,ज़मीं पे कहाँ  रहते हैं ,

तकदीर  के यह चमकते सितारे होते हैं.

जिनको  देखकर आँखें भी चोघियाँ जाये ,

मत छूना इन्हें ,यह जला भी देते  हैं.

सर से पांव तक  दूध के धुले हैं जनाब !,

पाकीजगी/सत्यता का प्रमाण लिए फिरते हैं.

अज़ीम रूहें हैं , फ़रिश्ते हैं  यह धरती के ,

तभी तो खुदा भी इनपर मेहरबां रहते हैं.

कोई बदी इनके पास फटके भी कैसे ? ,

अपनी फितरत को काबू करना जानते हैं .

सूना था ताड़ने वाले कयामत की नज़र रखते हैं,

पर ये छुपे रुस्तम भला  ताड़े जा सकते हैं |

मत कर ”अनु”  कोशिश इनके तह पर जाने की ,

उलझ कर रह जाएगी ,यह कई परतों से ढके होते हैं.

 

 

 

 

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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