ग़ज़ल

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ग़ज़ल

By | 2018-04-08T17:09:42+00:00 April 8th, 2018|Categories: गीत-ग़ज़ल|Tags: , , |0 Comments

दिख रहा है आदमी से आदमी जलता हुआ ।
क्या ज़माना आ गया है, बाग़ भी सहरा हुआ ।

आँख में पानी नहीं है…. खूँ भरा कैसे मगर,
मर्सिया सब पढ़ रहें हैं, सांस पर पहरा हुआ ।

तप रहा है चाँद भी अब, पड़ गया सूरज नरम,
है मशक़्कत में बसर अब, है बशर सहमा हुआ ।

चार दिन की ज़िन्दगी है, फिर सफ़र तो ख़ास है,
है लिपट जाना कफ़न में, क्या तिरा मेरा हुआ ।

दी ख़ुदा ने ज़िन्दगी जो…..”राज” तू ये जान ले,
ज़िन्दगी बस इक सफ़र है….मौत से हारा हुआ ।

@ राज

सहरा- जंगल, बसर- जिंदगी, बशर- आदमीं

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ऋतुराज, पिता- डा. गौरी शंकर प्रसाद, निवासी - मुजफ्फरपुर, बिहार

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