पलाश  (भाग-१)

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पलाश  (भाग-१)

By | 2018-04-08T20:17:22+00:00 April 8th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

 

पलाश के वृक्ष को माध्यम बना कर समाज के कुरीतियों एवं मनुष्य के स्वार्थ परता को उजागर करने का काव्यात्मक प्रयत्न कर रहा हूँ| दो भागों में उधृत ये रचना, मनुष्य जाति की कृत्रिमता से क्षुब्ध पलाश के मनोव्यथा एवम चंद प्रश्न, आपके समक्ष रखती है ;और इसके लिए मैं दुसरे भाग के अंतिम पक्ति तक आपके साथ की अपेक्षा करता हूँ|


||पलाश||

पतझड़ी पवन संग उड़ चुके,

तरु के पत्ते धरा के धूल|

वासन्ती नटी ने बिखराया तब,

चहुँदिशि पलाश के लाल फूल |

 

या उस बावली ने रंगा दिगन्त,

भर-भर कर कर में अरुण पराग।

या नीलाम्बर के अधोभाग में,

मानो धधक रही हो आग |

 

या लाल रंग के दरो दीवार पे,

हो नील नभ का बितान तना |

या बितान तले गेरुई रंग का,

मानो एक मंच सा बना  |

 

अंग लुटाता यह दधीचि – सा,

पर है यह न कोई बड़ी बात |

इसके जिन्दे तन पर भी,

पडते कुठारों के आघात |

 

पत्तियाँ उत्सर्जित करतीं जल कण,

मिटाती परिवेष का प्यास।

करती पुष्ट ओजोन परत भी,

तभी राजकीय पुष्प है पलाश  |

 

फूल – मूल औ बल्कल से इसके ,

बनती औषधियाँ अनगिनत|

नाना बिध से करता है यह,

हम मानवों का निरंतर हित |

 

चेतना की जलना व चक्षु की पीड़ा,

लेकर लगी जब आने होली|

तब जाकर कहीं हमारी ,

चेतना की लोलक डोली  |

 

कहने लगा पलाश ने एक दिन,

पाकर वन में मुझे अकेला|

थी वासन्ती संध्या उस दिन,

थी कलरव मुखरा सुरमई बेला |

 

एकदा ,क्रौंच युगल में से एक,

ब्याध के शर से होकर निहित|

देख अपर को व्याकुल व्यथित,

हुए थे कवि अति मर्माहत |

 

हुए फिर आद्र नयन,

हुए सिक्त कवि के कपोल|

नयनों के राह से फूट चली ,

प्रथम कविता मे व्यथा के बोल |

 

हाँ – हाँ, पुरखों ने देखा था मेरे,

शब्दों की कलियाँ खिलते |

आदि कवि के कोपल से,

कविता के फूलों को झरते |

 

रोया ना था सिर्फ कवि उस दिन,

रोया था सारा वन – उपवन |

हम वाक् शक्ति से यद्यपि हीन,

पर  रोते हंसते हैं मन ही मन |

                            ….क्रमशः

 – सुबल चन्द्र राय “सुधाकर”

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