गुनाह

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गुनाह

By | 2018-04-14T12:29:40+00:00 April 14th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

सुना था की खुशियों के चमन की कल्पना हर इंसान करता है,
हम भी इस ख़ुशी में शरीक हुए तो क्या गुनाह किया,
इस भरी दुनियां में हर दर पे सरों को झुकते हुए देखा है;
हमने रब से सर- ए -ताज की तम्मना की तो क्या गुनाह किया ?

हर कोई दिल में एक नफ़रत की आग लिए बैठा नजर आता है,
इस जख्म- ए -दिल के लिए प्यार की दुआ की तो क्या गुनाह किया
उम्र भर बेगानों की ख़ुशी को अपनी ख़ुशी समझते रह गए
ख्वाब में खुद के लिए गर दुआ निकली तो क्या गुनाह किया ?

सारा आलम अपने राज को सरेआम किये बैठा है
“राज” ने राज को राज ही रहने दिया तो क्या गुनाह किया?

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About the Author:

मेरा नाम संजय सरोज है और मै मुंबई में अपनी पूरी फैमिली के साथ रहता हूँ​, हिंदी से स्नातक यहीं मुंबई से ही किया है. वैसे मेरा नेटिव प्लेस जौनपुर उत्तरप्रदेश है फ़िलहाल मै एक प्राइवेट कंपनी में ८ वर्षों से कार्यरत हूँ कभी- कभी कुछ कवितायेँ और रचनाएँ लिखता हूँ मुझसे आप निचे दिए गए मोबाइल नंबर और ईमेल पर सम्पर्क कर सकते है आपका, संजय सरोज मोबाइल ​ :- ९९२०३३६६६० /९९६७३४४५८८ ​ ईमेल : sanjaynsaroj@gmail.com sanjaynsaroj@yahoo.com

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