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By | 2018-04-15T18:40:36+00:00 April 15th, 2018|Categories: कविता|Tags: , |0 Comments

 

रवि सागर – तल जब लीन हों,
दिवस बीते और साँझ आए,
फिर साँझ ढले और तारागण,
झिलमिल – झिलमिल मुस्काएं ;
चँदा जोत बिखेरे फिर भी,
रात रानी के हों केश घने,
आने वाला राह न भूले,
इस कारन
देहरी दीप जला री सुलोचने !
हँसकर बोली सुलोचना . . .
मेरे नीरज नयना बावरे
कहें नीरव पंथ निहार
दीप जलें उसके घर में
जो बैठा मुझे बिसार . . . !

* १३-११-१९७४ के दिन यह पंक्तियाँ लिख चुकने के बाद लेखनी उठाकर एक ओर धर दी । चालीस बरस बीत गए । तब की डायरियाँ कहाँ गईं , कुछ पता नहीं ? बस यही एक अधूरी – सी डायरी और कुछ पन्ने ही शेष रहे ?

अनुज समान इंद्रजीतसिंह , (संपादक, पंजाबी मासिक ‘सत समुंदरों पार’) , जब भी मिलते यही कहते कि “आपने लिखना क्यों छोड़ दिया ? आप कुछ भी लिखिये , मुझे दीजिये , मैं अपनी पत्रिका में प्रकाशित करूंगा ” ।

मैं हँसकर टाल देता ।

परंतु , एक दिन संपादक महोदय विजयी हुए । दिसम्बर २०१३ से फिर से लिखना शुरु किया ।

आप मित्रगण , जो मेरी रचनाएँ पढ़ा करते हैं , तो इसका एकमात्र श्रेय मेरे संपादक , इंद्रजीतसिंह को है ।

धन्यवाद !

१५-४-२०१८
वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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