पगली

पगली

By | 2018-04-17T01:24:49+00:00 April 17th, 2018|Categories: कहानी|Tags: , , |1 Comment

कैंसर शब्द सुनते ही रीना पर वज्रपात गिर गया। पिछले एक वर्ष से गिरती सेहत से परेशान रीना के मुख से एक शब्द भी नही निकला बस आंखों से गंगा-जमुना बह निकली। एक वक्ष काट कर अगल करने के बाद कीमोथैरेपी और रेडिएशन में लगभग एक वर्ष का समय लगेगा। वक्ष को बचाया नही जा सकता।

 

“राकेश मैं ऑपेरशन नही करवाउंगी। मुझे मरना मंजूर है।”

राकेश ने रीना को बहुत समझाया पर रीना अडिग रही। “राकेश मैं अपंग हो कर नही जी सकती। वक्ष नारी का अभिंग हिस्सा है। नारी की सुंदरता वक्ष से है। मैं बिना वक्ष नही रह सकूंगी।”

“रीना जीवन अनमोल है। उसे गवाना नही है। जब कैंसर का इलाज संभव है तब मन से नकारात्मक विचार दूर कर के सिर्फ इलाज के बारे में सोचना चाहिए। अभी उम्र ही कितनी है, सिर्फ पचास। बच्चों का विवाह तुमने रीना अपने हाथों से करना है। डॉक्टरों की सलाह मान कर इलाज शुरू करवाओ।”

“क्या तुम मुझे एक वक्ष के साथ स्वीकार करोगे?”

“रीना चौबीस की उम्र में विवाह हुआ। तन का मिलन और आकर्षण विवाह के लिए और सुखमय जीवन के लिए आवश्यक है तो दूसरी ओर मन का जुड़ाव और एक दूसरे पर जीवन न्यौछावर विवाह का सबसे बड़ा मंत्र है। तन का मिलन उम्र के साथ कम होता है और मन का मिलन बढ़ता है। अब तक मेरे अच्छे, खराब समय में चट्टान की भांति तुमने सहारा दिया है। अब मेरा दायित्व है कि इस समय चट्टान की भांति मैं तुम्हे सहारा दूं। तुम जैसी थी मैंने स्वीकार किया था और जैसी होगी, स्वीकार है। तन का आकर्षण बढती उम्र में कम होता है। अग्नि के समक्ष हर हालत में एक दूसरे का सहारा बनने की शपथ ली थी। उसको मत भूलो। सुख में मैं तुम्हारे साथ था, आज दुख से तुम्हे उबारना मेरा धर्म और कर्तव्य है।”,

 

एक महीने के कठिन प्रयास के पश्चात रीना ने कैंसर के इलाज की अनुमति दी। ऑपेरशन से पहले रात को अस्पताल में रीना गुमसुम कमरे की दीवार पर टकटकी लगा कर आंखों से गंगा-जमुना बहा रही थी। राकेश ने उसके माथे पर हाथ रखा और उसका हाथ अपने हाथों में लिया। अचानक उसकी नजर रीना की हथेली पर पड़ी। हाथों पर सामान्य रेखाओं के स्थान पर कटी फटी रेखाओं का जाल था। राकेश स्तब्ध हो गया और दिल ने जैसे धड़कना बंद कर दिया। ये हाथ की रेखाएं क्या दर्शाती है? कोई अनहोनी? राकेश को कुछ नही सूझ रहा था। खुद को नियंत्रित करके रीना को सांत्वना दी।

“पगली चिंता मत कर। तुम नित्य प्रभु वंदना करती हो। ईश्वर हमारा रखवाला है वह भला ही करेगा।”

रीना कुछ नही बोली। राकेश के हाथ से मुंह ढक कर रो दी।

 

अगली सुबह ऑपेरशन सफल रहा। रीना दो दिन बाद घर वापिस आई। राकेश ने रीना का हाथ देखा। हथेली से कटी फटी रेखाएं गायब थी और पहले की तरह सामान्य रेखाएं थी। राकेश किसी बुरी संभावना से मुक्त हो गया।

घर पर राकेश और बच्चे रीना की हर जरूरत का ख्याल रखते। राकेश के स्नेह ने रीना की सोच परिवर्तित कर दी। एक सप्ताह बाद रीना ने घर के काम धीरे-धीरे करने आरम्भ किए।

“रीना तुम्हे आराम की जरूरत है। काम हम कर लेंगे।”

“राकेश तुम्हारे सहारे से खड़ी हूं। काम से मत रोको। समर्थ से करूंगी। डॉक्टर ने भी बिस्तर पर आराम नही बोला है। मैं रोगी नही हूं। तुम अपना कर्तव्य पूरा कर रहे हो। मुझे अपने कर्तव्य से मुख नही मोड़ने दो।”

एक महीने बाद कीमोथैरेपी शुरू हुई। बाल झड़ने पर चुन्नी से सर ढक कर रखती। घर से बाहर निकलना बंद कर दिया। रीना की दुनिया घर और अस्पताल तक सीमित थी। डे केअर में कीमोथैरेपी के दिन सुबह खाना बनाती और दोपहर वापिस आने पर स्वयं राकेश को खाना परोसती।

कीमोथैरेपी और रेडिएशन में एक वर्ष बीत गया।

“रीना जी आपका कैंसर का इलाज समाप्त हुआ। आपको हर छ महीने बाद चेकअप के लिए आना है। यदि आवश्कयता हो तो पहले भी आ सकते हैं।” डॉक्टर के शब्द सुनकर रीना मुस्कुरा दी।

 

रात के समय राकेश की बाहों में एक मुद्दत के बाद सिमट कर रीना ने आत्मविश्वास से आंखों में आंखें डालते हुए पूछा।

“कैसे लग रही है यह एक वक्ष कटी और गंजी पत्नी?”

रीना के गाल पर एक चुम्बन अंकित करते हुए राकेश ने कहा।

“पगली।”

“तुम इतने अच्छे क्यों हो? क्या जरूरत थी मेरा इलाज करवा के अच्छा करवाने की?”

“क्योंकि तुम पगली हो। पागलों का विशेष ध्यान रखा जाता है।”

दोनों मुस्कुराने लगे।

 

 

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About the Author:

कहानियाँ लिखना शौक है। फुर्सत के पलों में शब्दों को जोडता और मिलाता हूं।

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  1. Sanjay Saroj "Raj" April 17, 2018 at 11:52 am

    सुन्दर !!!!!!

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