मैं माँ केवल माँ

मैं माँ केवल माँ

By | 2018-04-16T22:19:43+00:00 April 16th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

भरी दोपहरी तपती गर्मी में पसीना बहाती ।
महल नहीं तो कुटिया की ही छाँव देना चाहती ।
तार-तार चीथड़ों से लाल को लू से बचाती ।
खुदा की प्यास भूल,सपनों के पतंग उड़ाती ।
मैं माँ केवल माँ ।।
निर्लज शराबी पति का सोच दिल धड़काती ।
क्या समेटूं क्या खरीदूं?यही सोच सताती ।
बिन थके पत्थरों पर चोट लगाते जाती ।
मैं माँ केवल माँ ।।
चलती हथौड़े की हत्थी शायद ढाढस थी बंधाती ।
कोमल तो है कमजोर नहीं यही याद दिलाती ।
फिर कुछ सोच पत्थर दिल के लिए आँसू बहाती ।
पत्थर तोड़ना सरल पर वही दिल कैसे पिघलाती ?
ढीठ फिर लाल के उज्जवल भविष्य के स्वप्न सजाती ।
मैं माँ केवल माँ ।।
।।मुक्ता शर्मा ।।

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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