नारी -सुरक्षा व् सम्मान : एक अनसुलझा प्रश्न (कविता)

नारी -सुरक्षा व् सम्मान : एक अनसुलझा प्रश्न (कविता)

क्या  नारी  कहीं सुरक्षित है ?

अपने घर ,

या  घर के बाहर !

पड़ोसियों  के घर ?

करीबी या दूर के रिश्तेदारों के घर,

ननिहाल /ददिहाल ?,

कहाँ?

और बाहर …..

शोपिंग मॉल ,

सिनेमा हाल ,

भरे बाज़ार मैं?

स्कूल /कॉलेज में ?

और भरे बाज़ार  में ?

क्या वोह सुरक्षित है ,

किसी रिश्ते  में ?चाहे वोह मायका हो ,

पिता ,भाई, दादा-नाना ,

मामा, चाचा ,  चचेरे -ममेरे भाई ,

पड़ोस के बनाये हुए मुंह बोले  भाई या चाचा -मामा ,

या ससुराल ही क्यों  न हो …

पति, ससुर,  जेठ,  देवर,  पति के दोस्त,

अपना पुत्र ,  पुत्र के दोस्त ?

नारी  शिक्षा  के मंदिरों  में  भी सुरक्षित है ?

शिक्षक-गण  , प्रधान अध्यापक  ?

सच है  यह  बेशक बहुत कड़वा है ,

नारी  कहीं भी सुरक्षित नहीं है ,

किसी भी जगह सुरक्षित नहीं है,

किसी भी रिश्ते  मैं सुरक्षित नहीं है .

पराये तो पराये ,यहाँ  सबसे करीबी /सगे  भी

कभी भी  अपना रूप बदल सकते हैं.

तोड़कर  रिश्तों की  मर्यादा ,

शर्मसार  कर  रिश्तों  की आत्मीयता को भी ,

इंसान  से खूंखार  भेड़िये बन सकते हैं.

और इन भेड़ियों  को दिखती है बस  नारी .

एक अबला नारी ! चाहे  वोह दुधमुंही बच्चियां हो ,

अबोध बालिकाएं हों,  बेक़सूर युवतियां ,

बुज़ुर्ग  महिलाएं,  या शारीरिक /मानसिक रूप से विकलांग

औरतें  ही क्यों न हो ?

इन सब के लिए  इनके ह्रदय में दया,

ममता ,सम्मान और स्नेह हो सकता है क्या ?

अरे इनके पास  दिल ही नहीं होता ,

इनके पास  ज़मीर भी नहीं होता .

और यह खूंखार भेड़िये,यह वेह्शी दरिन्दे   सारे

समाज में  फैले हुए हैं .

इंसानी  मुखौटा लगाकर.

फिर  तुम्ही बताओ ! 

कैसे  सुरक्षित हो सकती नारी ?

 

 

 

 

 

 

 

 

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संक्षिप्त परिचय नाम -- सौ .ओनिका सेतिया "अनु' , शिक्षा -- स्नातकोत्तर विधा -- ग़ज़ल, कविता, मुक्तक , शेर , लघु-कथा , कहानी , भजन, गीत , लेख , परिचर्चा , आदि।

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