तुम चाहती हो कि

Home » तुम चाहती हो कि

तुम चाहती हो कि

By | 2018-04-17T21:17:41+00:00 April 17th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

तुम चाहती हो कि –
मैं सेहरा बांधकर तुम्हारे घर आऊं
पर क्या तुमने जाना
कि –
तुम महलों में सोती हो
मैं कच्चे मकां में रहता हूँ

तेरे श्रृंगार सोने चाँदी के
मैं खाली जेब लिये फिरता हूँ

तू महंगी गाड़ियों में घुमती है
मैं पैदल – पैदल फिरता हूँ

तू उम्र में भी बड़ी है मुझसे
मैं यूं भी दुबला पतला लगता हूँ

तुम फिर भी चाहती
कि मैं सेहरा बांधकर तुम्हारे घर आऊं

तो मैं भी अपने दिल की कहता हूँ
मैं प्रेम बहुत तुमसे करता हूँ
मैं प्रेम बहुत तुमसे करता हूँ

—– महेश चौहान चिकलाना

Comments

comments

No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  • 3
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    3
    Shares

About the Author:

लिखने का शौक है

Leave A Comment