गुब्बारों सा चंचल बचपन

गुब्बारों सा चंचल बचपन

गुब्बारों सा चंचल बचपन, आओ खेलें कहती दिल की धड़कन
जीवन की इस आपाधापी में, न जाने कहाँ खो गया बचपन.

बारिश की गीली और सौंधी मिटटी के, वो कच्चे टेढ़े-मेढ़े घरौंदे
लाल-पीले, नीले-काले रिबनों से गुंथे, वो सहेलियों के लम्बे परांदे
कुछ भी नहीं भूले, हैं याद आज तक, वो खुले खेत और ढके बरामदे
जीवन की इस आपाधापी में, न जाने कहाँ खो गया बचपन.

नन्हे-नन्हे पैरों से चल कर, वो लम्बी पगडंडियाँ नापना
लुका-छिपी में पकड़े जाने पर, वो हथेलियों से मुंह को ढांपना
कंचे, गिट्टे खेलना, लट्टू घुमाना, तितलियों के पीछे पहरों भागना
करके याद बचपन के वो दिन, दिल हो जाता है कतरन-कतरन
जीवन की इस आपाधापी में, न जाने कहाँ खो गया बचपन

Comments

comments

Rating: 4.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...
Spread the love
  • 7
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    7
    Shares

About the Author:

सरकारी नौकरी में हूं एव समय मिलने पर तुकबंदी कर लेता हूं।

Leave A Comment