जग्गी तांगे वाला

जग्गी तांगे वाला

By | 2018-04-23T20:57:37+00:00 April 23rd, 2018|Categories: संस्मरण|Tags: , , |0 Comments

नारनौल के तांगे के साथ बचपन की बहुत सी यादें जुड़ी हैं। १९७४ में कक्षा-५ में पिलानी पढ़ने जाने से पहले नारनौल में मेन बाज़ार के पास स्थित मनुज मालती हाई स्कूल में पढ़े और घर था नई अनाज़ मण्डी में, इसलिए प्रतिदिन स्कूल जाने के लिए था — जग्गी का तांगा। अधिकतर बच्चे तांगे से ही स्कूल आना जाना करते थे। दूसरा प्रसिद्ध तांगे वाला था प्रताप तांगे वाला, जो हमेशा बढ़िया नस्ल का लंबा घोड़ा रखता था और हम सबकी बड़ी कामना थी कि हमारे तांगे वाला जग्गी भी प्रताप के घोड़े जैसा बढ़िया घोड़ा लेकर आए।

वैसे जग्गी बहुत मस्त तबियत का बांका नौजवान था जो हम सब को बैठा कर तांगा चलाते हुए उस वक्त के फिल्मी गाने भी गाता था और हम सब बच्चे भी ऊंची आवाज़ में गाने में उसका साथ देते थे। मुख्य गीत होते थे – “मैं जहाँ चला जाऊं बहार चली आए, ओ महक जाए राहों की धूल, मैं बनफूल बन का फूल” और “लड़की चले जब सड़कों पे, आये कयामत लड़कों पे” । यह हम बच्चों को कभी समझ नहीं आया कि बाद वाला गीत जग्गी हम से तब ही गवाता था जब सामने से कॉलेज जा रही लड़कियों का झुंड आ रहा होता था। सच में बहुत मजा आता था और मन को बहुत भाता था जग्गी के तांगे में हर रोज़ स्कूल आना जाना। अधिक परिचालन खर्चे और आधुनिक यातायात के साधनों के चलते नारनौल में बस नाम के लिए ही अब चार-पाँच ताँगे रह गए हैं।

जग्गी अब बहुत उम्र-दराज़ हो गया है और नारनौल के बास मौहल्ले स्थित अपने घर पर ही रहता है। ईश्वर उसे अच्छा स्वास्थ्य और लंबी उम्र बख्शे ! आमीन ! 

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सरकारी नौकरी में हूं एव समय मिलने पर तुकबंदी कर लेता हूं।

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