‘धर्म’ वाली रोटी

‘धर्म’ वाली रोटी

By | 2018-04-26T00:10:07+00:00 April 25th, 2018|Categories: लघुकथा|Tags: , , |1 Comment

इतनी बड़ी रोटी..इतनी बड़ी रोटी तो ‘मुसलमान’ लोग बनाते है।😲…थोड़ी छोटी बना सुंदर सुदर सी। … ‘क्या बाऊजी आप कब से रोटियों में धर्म निकालने लगे, अब क्या रोटियों को भी ‘धर्म’ से जोड़ोगे’… कहते हुए गुड़ियाँ ने तवे से नीचे अपने दादाजी के लिए रोटियाँ उतारी। हम्ममम बहुत बड़ी-बड़ी बात मारने लगी है तू, पहले रोटी बनानी सीख…कहते हुए उसके दादाजी सलाद के लिए टमाटर,खीरा और ककड़ी काटने लगे…’ अरे बाऊजी अब टमाटर को ‘हिंदू’ और खीरे,ककड़ी को ‘मुसलमान’ ना कह देना।’….अरे पागल वो ‘रोटी’ की बात तो मैंने ऐसे ही बोल दी थी। … ‘ऐसे ही बात-बात पर कभी हिंदू-मुसलमान नही निकलता बाऊजी, आप घर के बड़े हो और बड़ो से ही बच्चे भी सीखते है। अच्छी-बुरी चीज़ो की शुरूआत घर से ही होती है। मैं तो रोटी बनानी सीख चूकी, आप कब सीखोगे चीज़ो से धर्म को हटाना, मेरी रोटी गोल ना सही पर ये ‘धर्म’ की नही ‘मोहब्बत’ की रोटी है।…
दादाजी की आँख में आंसू थे.. उनकी पोती ने कितनी अच्छी सीख दी है।

साहिबाचौहान

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  1. Sanjay Saroj "Raj" April 28, 2018 at 11:01 am

    बहुत खूब !!!!

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