हा ! प्राण सखा . . . . . !

हा ! प्राण सखा . . . . . !

By | 2018-04-26T23:33:41+00:00 April 26th, 2018|Categories: गीत-ग़ज़ल|0 Comments

* १-१-१९७३ को लिखा गया था यह गीत *

* * *
हा ! प्राण – सखा . . . . . !
* * *

बिन काजल कजरारी पलकों ने
तपती – जलती मरुभूमि में
जल – शीतल कितना बरसाया
उर की काँखें तक भीग गईं
दल – बादल का मन भर आया

ये कैसा विधि का विधान हुआ
हा ! कैसा शर – संधान हुआ
हुआ तार – तार मेरा चीर – चीर
बसी पोर – पोर में पीर – पीर

कैसा निर्दय मन – उपवन पर पतझर छाया
उर की काँखें तक भीग गईं . . . . .

वो लता – कुञ्ज वो नदी – तीर
वो मधुर मिलन औ’ मधु – समीर
वो खिलती चाँदनी रातों में
बस बीत गई जो बातों में

तिरती-उतराती यादों ने कब-कब कितना तड़पाया
उर की काँखें तक भीग गईं . . . . .

पथ – प्रदीप सब शूल हुए
तुम दिनकर दिन में हूल हुए
तुम्हें देख कुसुम जो खिलता था
हा ! प्राण – सखा वो झर आया

उर की काँखें तक भीग गईं
दल – बादल का मन भर आया . . . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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