हे प्रेम तुम्हारी मज़दूरी में

हे प्रेम तुम्हारी मज़दूरी में

By | 2018-05-02T22:28:15+00:00 May 2nd, 2018|Categories: कविता|Tags: , |0 Comments

हे प्रेम तुम्हारी मज़दूरी में
डर- डर के आगे बढ़ते हैं ।
चंचल तू हमेशा बनी रहे।
तेरे माथे पर न शिकन पड़े ।
कुछ झूठा-झूठा हँसते हैं ।
तुम को प्रिय खुश रखने की
हम हर पल कोशिश करते हैं ।
हे प्रेम तुम्हारी मज़दूरी में
डर- डर के आगे बढ़ते हैं ।
H.D.चैनल चलवा कर
LED भी फिट करवा कर
नई तकनीक की मशीनों से
नित अपना घर हम भरते हैं ।
पूरी जांबाज़ी से हे प्रिय!
हर जुल्म तेरा हम सहते हैं ।
हे प्रेम तुम्हारी मज़दूरी में
डर- डर के आगे बढ़ते हैं ।
हर माह फिल्म दिखलाता हूँ ।
Shopping भी खूब कराता हूँ ।
काम न करना पड़े तुम्हें
नौकरानी का बोझ उठाता हूँ ।
Beauty parlour न miss हो जाए कहीं
कहीं purse न खाली हो जाए!
सारी कमाई लाकर प्रिय!
तेरे ही हाथ में धरते हैं ।
हे प्रेम तुम्हारी मज़दूरी में
डर- डर के आगे बढ़ते हैं ।
श्रोता पक्का मैं बना रहूँ ।
जुबान कहीं न खुल जाए।
हर dress में unfit हो चाहे
तारीफ मेरी fit कर जाए।
तेरे over makeup पर भी
रसीले शेर हम कहते हैं ।
इतने पर भी देखो प्रिय
मिलने के पल को तरसते हैं ।
विरह की आग में जलते हैं ।
हे प्रेम तुम्हारी मज़दूरी में
डर-डर के आगे बढ़ते हैं ।।
।।मुक्ता शर्मा ।।

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

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