ये दिल पूरी तरह से तोड़ दो !

ये दिल पूरी तरह से तोड़ दो !

* * * * *
२६ – ३ – १९७३
पुरानी यादें !
* * * * *

ढलती हुई शाम
सुराही और जाम
ग़म की परछाइयाँ
ज़माने भर की रुसवाइयाँ
सिर्फ हमारे नाम कर दो यारो !
बस इत्ता-सा इक और काम कर दो यारो . . .
और फिर हमको तन्हा छोड़ दो
ये दिल पूरी तरह से तोड़ दो . . .

क्यूँ कोई आए समझाने
कि हम हैं दीवाने
यूँ जाने-अनजाने
निकल आए हैं जो
इस राह पर तो
न लौटेंगे अब किसी भी बहाने
हर गली में
हर मोड़ पर तुम
हमें खूब बदनाम कर दो यारो
बस इत्ता-सा इक और काम कर दो यारो . . .

होंठों पे कोई कहानी नहीं है
आँखों में छलकता पानी नहीं है
कल की कोई बाकी निशानी नहीं है
जो पास में है दौलत
तुम्हारे दिए हुए हैं ज़ख़्म
वो अपनी नशीली जवानी नहीं है
न मौत आए कभी
तड़पा करें बस यूँ ही
कुछ ऐसा हसीन इंतज़ाम कर दो यारो
बस इत्ता-सा इक और काम कर दो यारो . . .

कुल रौशनियाँ बुझा दो
हमारी राहों में काँटे बिछा दो
हर सोये हुए तूफाँ को जगा दो
कहीं ठहरें जो घर बनाने को हम
जो काम आ सके हमारे
वो हरेक तिनका जला दो
और अगर बस में हो तुम्हारे
इस अधूरे अफसाने का
इसी स्याह वर्क़ पे अंजाम कर दो यारो
बस इत्ता-सा इक और काम कर दो यारो . . .

फिर हम होंगे और तन्हाईयाँ
तुम्हारे घर बजेंगी शहनाईयाँ
जब भी कभी ऐसा समां आएगा
अपना टूटा हुआ दिल ये गाएगा
ढलती हुई शाम
सुराही और जाम . . .
चलती-फिरती इस लाश का
इसी लम्हा काम तमाम कर दो यारो
बस इत्ता-सा इक और काम कर दो यारो . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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