लघुकथा वितृष्णा

लघुकथा वितृष्णा

By | 2018-05-10T22:32:57+00:00 May 10th, 2018|Categories: कहानी|Tags: , |0 Comments

सवेरे सवेरे मोबाइल बजने लगा मां जोर से आवाज देते हुए कहा मुक्ता मोबाइल बज रहा है सुनती नहीं हो, कमरे से बाहर भागकर आयी मोबाइल मैंने बाहर छोड़ दिया था देखा मेरी सहेली दिया का फोन है देख कर खुश हो गयी उसने बताया कि कल रात को ही अपनी ससुराल से आयी है कहने लगी मिलने आ जाओ।
मुक्ता अपना सारा काम छोड़ उत्साहित होकर अपनी सहेली से मिलने चल दी, मन ही मन सोचने लगी बहुत दिनों बाद आयी है जाने कब से बात नहीं की हम दोनों आज सारी कसर निकालेंगे जमकर बात करेंगे। हम दोनों गले मिले फिर मैंने पूछा आचानक कैसे आना हुआ साथ ही ये बताया कि मेरी शादी पक्की हो गई है नम्बवर में शादी है इतनी जल्दी बता दिया मई चल रहा है तेरे पास बहुत समय है तैयारी करने का अब तू बता कैसे आयी है।
उसने बताया कि मेरी बहन के लिए लड़का देखा है मुझे उस के बारे में सलाह लेने के लिए बुलाया है। लड़का आईपीएस अधिकारी है, लड़के ने और मेरी बहन ने एक दूसरे के लिए हां कह दी है बस रिश्ता पक्का (सगाई) करना ही बाकी है। दिया कहने लगी मुझसे कि उसे इतने अच्छे परिवार इतने अच्छे लड़के के साथ पक्का होने पर झटका सा लगा ऐसे कैसे हो सकता है अगर इसकी शादी आईपीएस से हो गई तो मेरी घर में क्या अहमियत रह जाएगी मेरा पति तो साधारण सा इंजीनियर हैं। मैंने माँ और पापा को भड़का दिया बोला लड़का ठीक नहीं है आईपीएस अधिकारी अच्छे नहीं होते शराबी और चरित्रहीन भी होते हैं इनकी जिंदगी कठिन होती है मेरे मां और पापा बहुत मान देते हैं और समझदार भी समझते हैं। इस लिए बस मेरे मां और पापा मान गए और मेरी बहन तो मुझपर अंधा विश्वास करती है और उन सबने विचार विमर्श करके उस रिश्ते को पक्का होने से पहले तोड़ दिया। फिर बोली मैं अपने से अच्छे घर में शादी नहीं होने दूंगी इस रिश्ते से तो माता पिता केवल बहन को ही पूछने लग जाएंगे मैं हाथ मलती रह जाऊंगी
उसकी बात सुनते ही मैं उसे अवाक देखती रह गई और मेरा मन उसके प्रति वितृष्णा से भर गया।
स्वरचित ##नीरजा शर्मा ##

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