शहर

शहर

शहर ….. ही शहर है,
फैला हुआ,
जहाँ तलक जाती नजर है
शहर ….. ही शहर है|
 
फैली हुई कंक्रीट
और का बड़ा अम्बार,
वक्त की कमी से बिखरते रिश्ते,
बढ़ती हुयी दूरी का कहर है,
शहर ….. ही शहर है|
 
पैरो से कुचला हुआ,
है अपनापन,
बस खुद से खुद के साथ,
विराना सफर है,
शहर …… ही शहर है|
 
मेरे दिल को ना भाया यह शहर,
इसमें मेरे गाँव जैसी बात नहीं,
यही मेरे शहर से गाँव,
 तक का सफर है,
शहर ….. ही शहर है|

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About the Author:

मेरा नाम ऋषभ शुक्ला है. आप सभी का स्वागत है मेरे साथ इस कहानियों और कविताओं के सफर में जहाँ आप पढ़ सकेंगे मेरे कुछ विचार, मेरे जीवन की कुछ घटनाएँ, और कुछ मुद्दे जो शायद हमें सोचने पर मजबूर करदे. मै अपने इस साहित्यिक सफर में ब्लॉग के माध्यम से आप सभी को मेरी सोच और दॄष्टिकोण से अवगत कराऊंगा, और आप सभी से उचित मार्गदर्श की अपेक्षा रखता हूँ.मेरे मन में जो भी भावनायें आती है या जो भी मै महसूस करता हूँ, मै अपने विचारो से सबको अवगत कराने का प्रयत्न करता हूँ, मै ऐसा नहीं कह रहा हूँ के मै लेखक या कवि हूँ, बस जो सोचा लिख दिया. अगर आप सभी को मेरा प्रयत्न अच्छा लगा तो थोड़ी खुशी मिलती है. ऋषभ शुक्ला

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