प्रेम बिना जीवन

प्रेम बिना जीवन

। । ओ३म् । ।

* * * प्रेम बिना जीवन * * *

भाग्य – रेखा के भाल पर दुर्दिन
इस तरह करते हैं नर्तन
वो कहें जाने की और जग देखे
यूँ नाटक का अवसान होता है
प्रेम बिना जीवन श्मशान होता है . . .

यूँ नाटक का अवसान होता है . . .

तेरे बिना दिन ये रात सरीखे . . .

लगता है पीछे कुछ छूट गया है
शीशे का सामान भीतर टूट गया है

पंख जले छाँव में स्वप्न – परी के
तेरे बिना दिन ये रात सरीखे

तूफ़ान के साये में भला दीपदान होता है
यूँ नाटक का अवसान होता है . . .

मैं कहूँ तू सुने अब वो वक्त कहाँ है . . .

फूलों का रंग वही है मगर चमक नहीं है
इकतरफा लगी आग में अब दहक नहीं है

रहे आबाद गुज़रा वो समां कम्बख़्त जहाँ है
मैं कहूँ तू सुने अब वो वक्त कहाँ है

आज के कांधे पे रखकर सिर बीता नादान रोता है
यूँ नाटक का अवसान होता है . . .

उड़ता हुआ पंछी इक जगह ठहर गया है . . .

मदहोश नहीं करते अब हवा के तराने
जलाता है न जगाता है चाँद किसी भी बहाने

ये अध्याय प्रेम – ग्रंथ का नया – नया है
उड़ता हुआ पंछी इक जगह ठहर गया है

यहाँ पढ़ चुके का घर न कोई सामान होता है
यूँ नाटक का अवसान होता है
प्रेम बिना जीवन श्मशान होता है . . . !

–  वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

Comments

comments

No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  • 3
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    3
    Shares

Leave A Comment