अब भी रोज बुनता हूँ सपने

अब भी रोज बुनता हूँ सपने

By | 2018-05-17T23:25:55+00:00 May 17th, 2018|Categories: कहानी|Tags: , |1 Comment

अब भी रोज बुनता हूँ सपने
अपने ही
किसी सुखद भविष्य की नहीं,
बुहार कर
कंकणों को
देने के लिए
कुछ स्वच्छ, सीधी, सपाट सड़क
अपनी जिम्मेदारियों को।
अब भी रोज चुनता हूँ कलियाँ
सजाने के लिए
प्रेयसी के घने अलकों में नहीं,
देने के लिए
एक छोटी निश्छल मुस्कान
अपने नन्हें भगवानों को
जिनकी हँसी, खुशी, और दुनिया
निर्मित की है
मैंने ही
अपने रक्त से।
अब भी रोज विद्रोह करता हूँ
छिन्न-भिन्न करने के लिए
कुंठित मान्यताओं को
एकनिष्ठ चली आ रही सत्ताओं का नहीं,
अपने अंतर के द्वंद्वों से
मन से जुड़े संबंधों से
जो कभी छद्म दिखते हैं
मेरी हानि ही लिखते हैं,
साथ ही
नोच डालना चाहता हूँ
दिखावे में उड़ने वाले पंख को
जिससे बनाऊँ एक साधन
और बुहारूं
कंकणों को
देने के लिए
कुछ स्वच्छ, सीधी, सपाट सड़क
अपनी जिम्मेदारियों को।

¨¨

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About the Author:

तमकुही रोड (सेवरही), कुशीनगर (उत्तर प्रदेश) के स्थायी निवासी केशव मोहन पाण्डेय ने एम.ए.(हिंदी), बी. एड. किया है। भोजपुरी में उनकी ‘कठकरेज’ (कहानी संग्रह) तथा मैथिली भोजपुरी अकादमी, दिल्ली से ‘जिनगी रोटी ना हऽ’ (कविता संग्रह) प्रकाशित हो चुकी है। उन्होंने साझा काव्य संग्रह ‘पंच पल्लव’ व 'पंच पर्णिका' का संपादन भी किया है। 'सम्भवामि युगे युगे' लेख-संग्रह प्रकाशित। वे वर्ण-पिरामिड का साझा-संग्रह ‘अथ से इति-वर्ण स्तंभ’ तथा ‘शत हाइकुकार’ हाइकु साझा संग्रह में आ चुके हैं। साहित्यकार श्री रक्षित दवे द्वारा अनुदित इनकी अट्ठाइस कविताओं को ‘वारंवार खोजूं छुं’ नाम से ‘प्रतिलिपि डाॅट काॅम’ पर ई-बुक भी है। आकाशवाणी और कई टी.वी. चैनलों से निरंतर काव्य-कथा पाठ प्रसारित होते रहने के साथ ही ये अपने गृहनगर में साहित्यिक संस्था ‘संवाद’ का संयोजन करते रहे हैं। इन्होंने हिंदी टेली फिल्म ‘औलाद, लघु फिल्म ‘लास्ट ईयर’ और भोजपुरी फिल्म ‘कब आई डोलिया कहार’ के लिए पटकथा-संवाद और गीत लिखा है। ये अबतक लगभग तीन दर्जन नाटकों-लघुनाटकों का लेखन और निर्देशन कर चुके हैं। वर्तमान में कई पत्रिकाओं के संपादक मंडल से जुड़े हुए

One Comment

  1. SUBODH PATEL May 18, 2018 at 7:23 am

    बहुत अच्छी बात कह दी आपने
    1. एक छोटी निश्छल मुस्कान
    अपने नन्हें भगवानों को
    जिनकी हँसी, खुशी, और दुनिया
    निर्मित की है मैंने ही अपने रक्त से।
    2. नोच डालना चाहता हूँ
    दिखावे में उड़ने वाले पंख को
    जिससे बनाऊँ एक साधन

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