राक्षस की जीभ

राक्षस की जीभ

By | 2018-05-17T20:59:52+00:00 May 17th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |1 Comment

पेड़ों के झुरमुट से झांकती
मीलों से अपना विकास आंकती
शहर से कस्बे , कस्बे से गाँव तक
मानव की यह रचना अजीब।।
यह काली कोलतार की जीभ।।

राह राही की मंजिल का।
रूप कहीं एकाकीपन का।
तो कहीं सुकुमार पहाड़ी पर चढ़ती।
एक-अनेक धारा में बहती ।
मानव की यह रचना अजीब ।।
यह काली कोलतार की जीभ ।।

वाहनों की भागम-भाग कहीं
कहीं भीड़ की रेलमपेल
कोई इस पर डर-डर चलता
तो कोई समझता छोटा सा खेल
भाव के अनुरूप खेल दिखाती
मानव की यह रचना अजीब ।।
यह काली कोलतार की जीभ ।।

कभी सपनों के फूलों से लदी
कभी मौत के पतझड़ सी
नियमों में बंधी,रोशनियों से सजी
मानव की यह रचना अजीब ।।
यह काली कोलतार की जीभ ।।

   – मुक्ता शर्मा 

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About the Author:

सरकारी स्कूल में हिन्दी अध्यापक के पद पर कार्यरत,कालेज के समय से विचारों को संगठित कर प्रस्तुत करने की कोशिश में जुटी हुई , एक तुच्छ सी कवयित्री,हिन्दी भाषा की सेवा मे योगदान देने की कोशिश करती हुई ।

One Comment

  1. SUBODH PATEL May 18, 2018 at 7:27 am

    बहुत खूब

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