कर्मफल

कर्मफल

By | 2018-05-21T20:37:13+00:00 May 21st, 2018|Categories: कहानी|Tags: , , |0 Comments

कर्मफल इंसान को एक न एक दिन अवश्य मिलता है चाहे वह माने या न माने। ये कैसे होता है कुछ पता नहीं चलता लेकिन यहाँ पर ईश्वरीय सत्ता सिद्ध हो जाती है । कई बार मनुष्य हताश हो जाता है किन्तु उसे न तो हारना चाहिए न ही किसी गलत राह पर कदम ही रखना चाहिए । सत्य का पक्ष हरगिज भी नहीं छोड़ना चाहिए । जानकी अपने दो बच्चों के साथ एक छोटे से मकान में रहती थी । उसके पति की
मृत्यु काफी पहले हो चुकी थी जब उसके दोनों बच्चे बहुत ही छोटे थे उनमें एक दो साल का और दूसरा चार साल का ही था । जानकी को कुछ दिन तक तो मायके का सहारा मिला फिर वो लोग भी हाथ खींचने लगे थे ।
“बहन तू अपने गाँव चली जा यहाँ शहर में तेरा कैसे गुजारा होगा ?” जानकी के भाई ने उसको सलाह देते हुए कहा ।
“हाँ भइया कुछ तो करना ही होगा ,बड़े की पढ़ाई भी तो है ,गाँव जाकर पता नहीं वह वहाँ पढ़ पायेगा या नहीं ।”
“अरे क्यों नहीं पढ़ पायेगा फिर ज्यादा पढ़कर क्या करेगा ? गाँव में खेती करके गुजारा तो कर लेगा ना ।”
भाई ने बहन को समझाते हुए सलाह दिया । कुछ रुपये बहन के हाथ में रख कर अपने दुखों का रोना रोने लगे । जानकी मजबूर थी अन्यथा वह उन पैसों को भी वापस कर देती । उसे याद है कि कैसे जब उसके पति थे तब उसी भाई की वह चुपके चुपके कितनी मदद किया करती थी । उसने अपने आँसू अपने अन्दर ही जब्त कर लिए ।वह आँसू बहाकर अपने बच्चों को जरा भी कमजोर नहीं करना चाहती थी ।
जानकी के पति ने अपने जीते जी दो कमरे का मकान बनवा दिया था । वही जानकी का सहारा बन गया । ससुरालवाले चाहते थे कि वह उस मकान को बेचकर उन्हें देदे और गाँव में आकर रहे किन्तु जानकी को यह मंजूर नहीं था । उसने अपने दोनों बेटों के लिए जो सपने सजाये थे वह उसे तोड़ना नहीं चाहती थी। वह अपने बेटों को डॉक्टर या इंजीनियर बनाना चाहती थी । उसने शहर में ही रहकर अपने बच्चों को पढ़ाने का संकल्प लिया। इस बात से ससुरालवालों ने तो आनाजाना ही बन्द कर दिया । वे शायद उसकी अग्निपरीक्षा ले रहे थे।
“देखते हैं कि बिना सहारे के यह कैसे रह लेगी।”जानकी के देवर ने अपनी माँ से कहा।
“अरे छोड़ दे उसे उसके हाल पर। खुद ही जब चार गहने खतम हो जायेंगे तो रोती हुई यहीं आयेगी ।” सासूमाँ ने बेटे का समर्थन करते हुए कहा ।
जानकी बेशक कम पढ़ी लिखी थी पर थी वह दृढ़प्रतिज्ञ ।शुरुआत के दिन उसके बहुत ही कष्टप्रद रहे । लोगों के कपड़े सिलती उससे भी न गुजारा होता तो चुपके से घरों मे काम करती पर बच्चों को बताती कि किसी कम्पनी में काम करती है । धीरे धीरे बच्चे भी बड़े होने लगे जो उसके सपने के अनुसार ही बहुत होनहार थे ।
जानकी ने भी सिलाई के साथ साथ कम्पनी में भी कामकरना आरम्भ कर दिया ।
सुबह उठकर बच्चों के लिए खाना बनाना ,टिफिन रखना बच्चों को स्कूल भेजते हुए कम्पनी जाना । पड़ोसन अच्छी थी वह अपने बच्चों के साथ जानकी के बच्चों को भी घर लाती ।
बच्चों की फीस किताब कापी ,खाना पीना सब कुछ पूरा करते करते कभी कभी तो खाने को अनाज भी नहीं रहता । वह साग खरीदकर लाती उसे उबाल कर नमक डालकर बच्चों को दे देती । बच्चे बिना सवाल जवाब के हंसीखुशी माँ के साथ बैठकर साग खाकर चुपचाप सो जाते । माँ को अपने बच्चों पर पूरा विश्वास जमता जा रहा था कि वे उसके सपने को एक दिन अवश्य पूरा करेंगे ।जानकी के बच्चे बचपन में ही बड़े हो गये थे ,वे अपनी माँ से  खिलोने तक की माँग नहीं करते थे । जानकी की पड़ोसन को सबकुछ पता था वह भी अपनी तरफ से जितना भी बन पड़ता जानकी की पूरी मदद करने को तैयार रहती थी ।
“सरिता तुम मेरे लिए कितना करती हो ?”
जानकी ने भावुक होते हुए सजल नयनों से सरिता की ओर ताकते हुए कहा ।
“नहीं जानकी मैं कुछ नहीं करती जो कुछ भी होता है ईश्वर की कृपासे ही होता है।”सरिता ने जानकी का हाथ पकड़ते हुए कहा।
समय अपनी गति से चला जा रहा था और देखते ही देखते बच्चे बड़ी कक्षाओं में भी आ गये ।बच्चे पढ़ने में बहुत ही तेज थे। हाईस्कूल में पहुँचते पहुँचते उन्होंने ने भी पाँचवीं तक के बच्चों को पढ़ाना चालू कर दिया । वे अपनी भी पढा़ई करते और ट्यूशन भी पढ़ाते । माँ के उम्मीद की किरण और तेज होने लगी थी। धीरे धीरै बड़ी कक्षाएं और बड़ी कक्षाओं का ट्यूशन। इण्टर करते ही दोनों का ही अच्छे सरकारी संस्थान में एडमिशन भी मिल गया ।
माँ की खुशी का ठिकाना ही न था । बी.टेक के अन्तिम वर्ष में बड़े बेटे की एक बहुत ही अच्छी कम्पनी में नौकरी लग गयी  दो साल बाद ही दूसरे बेटे की भी नौकरी लग गयी । बड़े बेटे की नौकरी लगते ही माँ को  कम्पनी का काम छोड़ने के लिए बाध्य कर दिया । अब जानकी के पास सबकुछ है और वही मायके और ससुराल के लोग फिर से आने जाने लगे हैं । जानकी के कर्म का फल उसे प्राप्त हो गया था।

डॉ.सरला सिंह

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शिक्षण कार्य टी.जी.टी.हिन्दी खाली समय में लेखन कार्य।

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