हे मानव

हे मानव

By | 2018-05-21T21:52:09+00:00 May 21st, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

हे मानव!
किससे करे चालाकी रे मन
सब तो नजर में उसके है ,
तू सोचे तेरे पैसों पर मोहित,
फिर तो बिलकुल भोला है।
बोया बाजरा न उगेगा गेहूँ,
ये भी काहे भूल रहा ।
कर्म किया वो ही भोगेगा,
चढ़ा चढ़ावा कितना भी ।
चाह रहा भगवान खरीदना,
इतना दर्प है दौलत पर ।
दौलत उसका दिया हुआ है,
फिर तेरा कैसे है भोले ।
सब धरती पर ही रह जाना,
जाना एक न धेला रे ।
फिर काहे का लगा झमेला ,
काहे पर तू इतना इतराये है ।
बिना बात हत्या कर देता ,
चोरी डाका की न पूछो रे ।
भाई भाई को भी न छोड़े ,
सबसे प्यारी दौलत है ।
बेटा बाप पर दागे गोली,
बाप से प्यारा पैसा है ।
अन्तिम बेला आई तब साथी,
गया न एक भी रत्ती रे ।
साथ जायेगा कर्म ही तेरा ,
बस उसका कर ले सुधार तू ।
बोयेगा बस वोही पायेगा ,
काम न आयेगा चढ़ावा रे ।
रे मन अब भी अवसर है तुझपे,
कर कुछ सच्चा काम तू ।
देवी पूजन करता है तू मानव,
जिन्दा देवी का तो कर मान रे।
मन्दिर घूम के आया है तो,
घर भी मन्दिर मान ले ।
बेटी ,बहन, माँ और पत्नी का ,
कर पहले सम्मान तू ।
घर जैसी ही बाहर की नारी ,
सबका कर पूरा मान रे ।
माने तुझको दौलत वाला तब,
भूखे बेघर को एक ठिकाना दे ।
सच्चा दौलत वाला तुझको माने ,
सब नारी का हो सम्मान रे ।
उन बच्चों को उनका बचपन दे ,
जो मजदूरी को हैं मजबूर रे ।
किससे करे चालाकी रे मन,
सब तो नजर में उसके है ।
                    – डॉ. सरला सिंह ।

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शिक्षण कार्य टी.जी.टी.हिन्दी खाली समय में लेखन कार्य।

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