टेक

टेक

। । ओ३म् । ।

टेक

प्रिये तुम्हारे अधरों पर
स्वीकार तो है मुस्कान नहीं
स्वच्छंद तुम्हारे विचरण में
यह बंधन तो व्यवधान नहीं

प्रिये तुम्हारे अधरों पर . . .

प्रियतम सुहानी भोर में
तुमसे अब मैं क्या कहूँ
भली करेंगे राम जी
भली है कि मैं चुप रहूँ

प्रियतम सुहानी भोर में . . .

एक मिलेगा एक से
फिर भी रहेंगे एक
हृदय में रक्त रक्त हृदय से
इक दूजे की टेक

एक मिलेगा एक से . . .

प्राण सखा मृदंग मत छेड़ो
छेड़ो मुरली की तान
कल परसों की मत पूछो
बढ़े तुम्हारा मान

प्राण सखा मृदंग मत छेड़ो . . .

सौगंध प्रिये तुम्हें मात की
कुछ ऐसा मिलाओ मेल
प्रकाश रहे सहेज लें
दीपक बाती और तेल

सौगंध प्रिये तुम्हें मात की . . .

तन दो इक हम प्राण हैं
सीधी सच्ची तुम्हारी बात
उसके आगे की सोचूं
दिन में दीखे रात

तन दो इक हम प्राण हैं . . .

दो से होंगे तीन हम
इसका मुझे है भान
दायित्व संसार चलाने का
परमपिता का है वरदान

दो से होंगे तीन हम . . .

कथनी तुम्हारी अटल है
ज्यों लछमन की रेख
राजा के बोल नित नये
जीवन रेखा में मेख

कथनी तुम्हारी अटल है . . .

प्रिये तुम्हारे अधरों पर
अक्षर के धर कमल देंगे
शपथ भावी संतान की
कल हम राजा बदल देंगे

प्रिये तुम्हारे अधरों पर . . .

इक आता इक जा रहा
बदलें केवल नाम
साजन जीना तब जियें
डोरी अपने हाथ में थाम

रे साजन ! डोरी हाथ में थाम . . . !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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