हे रवीन्द्र !

हे रवीन्द्र !

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हे रवीन्द्र !

अजेय चेतन मन
खाड़ी बंग की और सुंदरबन
विजयोन्माद में दहाड़ता
वीर्यवान भगधारता
साथियों को पुकारता
बिहू के संग
होली की उमंग
पोंगल बैसाखी में सना
दक्खिन – गंगा का घूंट
साथ में गुड़ चना
शिवा का छत्र
राणा की दृष्टि वक्र
हृदय भरे हुए भावों से
शोभित सांगा वीर घावों से
रत्नाकर का अंश
तुलसी का वंश
कबीर सूर की बाहमनी
मेधा रांगेय राघव की
मुंशी जी की लेखनी
उन्नत भाल
वक्ष विशाल
अजेय चेतन मन
कथनी करनी इक करी
शत्रु विकराल
छोड़ भागा पगधरी
सपूत भारती का
मुंडे मुंडे जी रहा
पिंडे पिंडे जागा मैंपना
जल – दस्यु पामारों से
सत्य के हत्यारों से
ठुकरा दूं सामंतपना
हे रवीन्द्र !

वेदप्रकाश लाम्बा ९४६६०-१७३१२

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