जब थे मेरे पापा

जब थे मेरे पापा

By | 2018-05-30T22:00:55+00:00 May 30th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

धूप में भी छाँव की मौजूदगी मिल रही थी

जब थे मेरे पापा मुझे ज़िन्दगी मिल रही थी

उदासी में भी हंसाने का हुनर रख रहे थे

जब उनके सीने पर सर रख कर हम सिसक रहे थे…..मेरे किरदार को हवा देने की वजह मिल रही थी….

जब थे मेरे पापा मुझे ज़िन्दगी मिल रही थी ।।

खून के रिश्तो में भी अब मिलावट हो रही है

अपनो के दिलो को तोड़ने की बगावत हो रही है

साथ मिलकर रहना अब दुश्व़ार हो रहा है

क्या

मेरे पापा का यही सपना था जो साकार हो रहा है….उनके बच्चों में अब आपस में दुुुुश्मनी

मिल रही थी

जब थे मेरे पापा मुझे ज़िन्दगी मिल रही थी।।

अपनो के लिए जिसने खुद को दाँव पर लगा दिया

हम निभा न सके हमने उसका किरदार भी गंवा दिया…

जो जाने वाले है कहाँ लौट कर आयेंगे

वो किताब था खुली हमने हर पन्ना जला दिया

उन्हें तो हमारे हसँते चेहरे से ही खुशी मिल रही थी

जब थे मेरे पापा मुझे ज़िन्दगी मिल रही थी।।।

हाथ पकड़कर एक दूसरे का साथ चल रहे थे

दरार ऐसी पड़ी एक दूसरे को छोड़ कर आगे निकल रहे थे

एहसास के मोती अब बिखरने से लग गये थे

बगावत अपनो से हो गई गैरो से मिल गये थे

मेरे पापा के घरौंदें पर तूफानी बौछार मिल रही थी

जब थे मेरे पापा मुझे ज़िन्दगी मिल रही थी।।।।।

हम तो वही हैं जो हमको आपने बना दिया

हालात कुछ भी हो साथ रहना सीखा दिया

जो बदल गये हैं उनका फिर बदलना अभी बाकी है

तेरे जिगर के टुकड़ों का मिलना अभी बाकी है …

तुुुझे याद करते करते रोने की वजह मिल रही थी

जब थे मेरे पापा मुझे ज़िन्दगी मिल रही थी।।।।।

 

Comments

comments

No votes yet.
Please wait...
Spread the love
  • 2
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
  •  
    2
    Shares

About the Author:

Leave A Comment