पेड़

पेड़

पेड़ आज भी वहीं है

खड़ा है पर खुश नहीं

कुछ कहना चाहता है पर

सहम जाता है भीड़ देख

शायद यही लोग थे,

उसके भाइयों के हत्यारे

मुझे एकटक देखते जा रहा है

इस आश में कि समझ सकूं,

उसका दर्द उसकी पीड़ा

ताजा जख्मों पर मरहम लगा सकूं

हृदय द्रवित होने लगा ,

प्राणदाता को पनाह मांगते देख

 

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