बारिश और बचपन

बारिश और बचपन

बारिश, मिट्टी की खुशबू, कागज की कश्ती…
बारिश में भीगने पर बच्चे को डांट रहे पिता को देख, अपने बचपन के गलियारों का चक्कर लगा आई…..
मैं अपनी बालकनी में बारिश का शोर सुनकर बड़ा खड़े होकर बारिश की बूंदों को देख रही हूं,  छई छप्पा छई छपाक छई…….  मिट्टी की खुशबू जब भी सूखी रेत पर पड़ती है…….. उसकी  खुशबू सूंघने का आनंद…. बस डूब जाती हूं ….. उस  सौंधी मदहोश कर देने वाली गंध में।  गांव की बात ही कुछ और थी। अब यहां फ्लैट संस्कृति में रहते इन सब से वंचित होना तो लाजमी है। कई बार मेरी बेटी नए मटके के पानी को, गमले में पानी देते हुए मिट्टी की सोंधी खुशबू को बखूबी महसूस कर  आनंदित….. होती है। बेटा भी बारिश में भीगने का लोभ  संवरण नहीं कर पाता, वह कोई ना कोई मौका निकाल ही लेता है भीगने का।
बारिश में भीगना मुझे, हमेशा से ही अच्छा लगता है।आज भी मैं और मेरे पति कई बार निकल जाते हैं, स्कूटर पर जानबूझकर बारिश में भीगने का आनंद लेने, फिर लौटकर  अदरक वाली  चाय पीने का मजा!!!!!!!!  वाहहहहहह!!!!!!!ये आंनद वही समझ सकता है जिसने यह जिया हो। यह आजकल के बच्चे कहां समझ समझेंगे, वह तो बस मॉल संस्कृति ही देख रहे हैं। बाहर बालकनी में बैठकर चाय पीना, बाहर ही शीशम का पेड़ बालकनी को छूता हुआ, उसके पत्तों पर पड़ी धूल धुल जाती है, उसकी सौंधी खुशबू, तथा पत्तों पर पड़ती बूंदों की आवाज, एक  मधुर संगीत घोल देती है कानों में। फिर से खो जाती हूं बचपन में। जब हम बच्चे थे हमारे पिताजी उस जमाने के हिसाब से  सख्त  पिता नहीं थे, वह हमारे साथ बैठकर खूब खुलकर बातें करते, किस्से-कहानियां कहा करते, वह पिता कम  दोस्त ज्यादा थे। बारिश को बुलाने के लिए, उनकी ही सिखाई कुछ पंक्तियां याद आ रही हैं____
1_काले मेघा ,काले मेघा।
काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़ धानी दे।
2 _ बरसो राम धड़ाके से
बुढ़िया मर गई फाके से।
बचपन में भीगने पर अक्सर डांट पड़ती थी। एक तो कपड़े सूखने की दिक्कत,उस समय वाशिंग मशीन तो थी नहीं, दूसरे  बीमार होने का डर। हम अक्सर स्कूल से लौटते समय सोचते काश! बारिश हो जाए। उसके बाद जहां पानी भरा मिल जाए उसमें  छप-छप करके कूदना…. रफ कॉपी के पन्नों से नावें बना कर पानी में चलाना……और फिर उन्हें दूर जाते देखते रहना……अगर बीच में ही डूब जाती तो दुःख भी होता,फिर दूसरी कश्ती तैयार…… दूसरे दिन न कपड़े सूखते न जूते। मां  अखबार घुसा घुसा कर जूते सुखाती और जब तक  ड्रेस धुलती, बाप रे हम चुपचाप सुनते रहते मां की डांट। हां कई बार जब ओले पड़ते थे, तो मां उनको जरूर भर कर रखती थी, कहती थी  ओले के पानी से जले हुए पर लगाने से  फफोले नहीं पड़ते।कई बार तो खा कर भी देखे। एक और बात ध्यान आ रही है, कई बार गांव में औरतें बारिश का साफ पानी भरकर एकत्र करती थीं, कि इस पानी से दाल जल्दी और अच्छी बनती है, पता नहीं कितना सच है,पर मुझे शायद ऐसा ही कुछ याद है।
एक बार याद है मुझे, हम सब बहन भाई निकल गए बारिश में भीगने के लिए, उस दिन पिताजी हमें पकड़ कर लाए और जो डांट और मार पड़ी वह आज भी याद है। फिर मां ने नहला कर कपड़े बदले, लेकिन उसके बाद बाहर भीगना लगभग बंद ही हो गया। मां ने नहलाया, कपड़े बदले, गर्म दूध पिलाया, खाना खिलाया तथा समझाया, इस तरह बीमार हो जाओगे। आज ना तो  डांटने के लिए  पिताजी हैं, और ना ही  तीमारदारी के लिए  मां। खुद ही सब समझना पड़ता है, हां वह जीवन में अपने बच्चों में जरूर जी रही हूं, लेकिन अब बच्चे भी बड़े होकर समझदार हो गए हैं।
अब ना वह  बचपन है, ना ही बारिश के पानी में नाव चलाता बचपन!!!! बहुत याद आती है यह सब चीजें।
बारिश भी इंतजार करती है कहां गए बच्चे ???? कोई नाव क्यों नहीं चलाता। आजकल तो मम्मियां भी कहां भीगने देती हैं बच्चों को। पूल में,वाटर पार्क में बेशक नहा लें। बरबस ही जगजीत सिंह की ये पंक्तियां याद आ जाती हैं___
यह दौलत भी ले लो यह शोहरत भी ले लो!
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी!
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन!
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी…….

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