प्रेम डायरी राधे-कृष्णा २

प्रेम डायरी राधे-कृष्णा २

(एक कल्पना(मात्र) राधे-क्रष्ण जी हेतु)

इक दिन राधी के मन मे
बात सबकी घर कर गयी
कहते सब बांवरी मुझे
संकोच से मन को भर गयी,

ना मिलु कान्हा से मैं
ना युमना तट पर जाऊंगी,
कान्हा भी कहा स्मरण करते मुझे
ना बांसुरी की धुन पैजनिया छनकाऊंगी,

ऐसे ही दिन का पहर
संकोच मे यूंही बीत गया
कान्हा भी हुये व्याकुल
और राधा जी का मन बैठ गया,

तभी कान्हा जी की आंखो से
एक अश्रु बह गया,
लिया विकराल रूप उसने
बन जल चक्र बरसाना की ओर बड गया,

धरा लगी कांपने बरसाना की
जल चक्र का भय मन मे सबके ठहर गया
देख जल चक्र संग कान्हा जी को
सबके मुख से राधे-राधे स्वर निकल गया,

देख ये राधा रानी रूठकर बोली
क्यो ये प्रेम का भ्रम दिखाते हो,
बरसाना की इस बस्ती को
काहे जल की लंका बनाते हो,

सब कहते मुझे बांवरी
जो बस कान्हा कान्हा करती हे,
मन नहीं रहता इसका वश मे
बांसुरी की धुन पर भी ये थिरकती हे,

सुनकर ये बात कान्हा जी के
मुख पर हंसी आ गयी,
विरह का उड गया जल चक्र
हाथो मे बंसी आ गयी,

वो बोले क्यो होती हो व्याकुल इनसे
क्यों मन मे संकोच करती हो,
नहीं भान इन्हे प्रेम का
क्यो विश्वास इन पर करती हो,

सुनो ध्यान से बरसाना वालो
एक बात तुम्हे मै कहता हुं,
बांवरा तो हुं मै राधा का
तभी उनके ह्दय मे बसता हुं,

आहट से ही राधा रानी के
मेरी ये बांसुरी बज उठती,
स्वयं निकलती प्रेम धुन इससे
जब राधा जी की पैजनिया छनकती हे….

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