वीज़ा

“हैलो…हाँ बेटा कैसे हो?”
“मैं ठीक हूँ माँ…तुम कैसी हो?”
“मैं भी ठीक हूँ बेटा…और शिल्पी और चीकू कैसे हैं?”
“सब ठीक हैं माँ, तुम्हारी याद आ रही थी।” आवाज़ में उदासी छा गयी।
“अरे…क्या हुआ? इतना परेशान क्यों है? मैं भी आ जाऊँगी वहाँ जल्दी ही…मैंने सारा सामान पैक कर लिया है। चीकू के लिए भी कुछ खिलौने और कपड़े ले लिये हैं…बस अब तू आ ही जा…” इधर सुमन का गला भी रुँध गया।
“अ…हाँ माँ…जल्दी ही तुम्हारे वीज़ा की अनुमति मिल जाएगी। मैंने एम्बेसी से बात कर ली है। जल्दी ही तुम्हें लेने आऊँगा माँ,” सुवीर ने कहा।
“बेटा दो साल हो गये…अभी तक अनुमति नहीं मिली? मुझे तो लगा कि तूने मुझे बुलाने के लिए फोन किया है” सुमन उदास हो गयी।
“व…वो…वो…माँ कुछ न कुछ समस्या आ जाती है। कभी इंडियन एम्बेसी से तो कभी यहाँ अमेरिकन एम्बेसी से…इसलिए देर हो रही है…लेकिन तू चिन्ता मत कर जैसे ही मुझे समय मिलेगा मैं तुरन्त सारी फारमैलिटी पूरी करके किसी भी तरह वीज़ा ले ही लूँगा।” सुवीर ने जवाब दिया।
“हाँ…हाँ…कोई बात नहीं, तू मन लगाकर काम कर। मैं यहाँ ठीक हूँ। दीप्ति और दामाद जी मेरा बहुत ध्यान रखते हैं।…बस कभी-कभी बहू और चीकू को देखने के लिए आत्मा तड़पती है तो…“ सुमन की आँखों में आँसू आ गये।
“अच्छा माँ, दीदी-जीजा कैसे हैं? मेरी तरफ से उन्हें हैलो कह देना…और हाँ मैं कल ही तुम्हारे अकाउंट में कुछ पैसे डलवा देता हूँ। अबकी होली पर तुम अपने लिए अच्छे से कपड़े, ड्राई फ्रूट्स और ज़रूरी दवाइयाँ ले लेना। मैं जीजा जी को बोल दूँगा।“ उदासी भरे वातावरण को भंग करते हुए सुवीर ने कहा।
“अरे पगले मुझे इन सब चीज़ों का क्या करना है? मेरा असली धन तो तू है। तेरे पास आने को ही मन मचलता है, वरना मुझे किसी भी चीज़ की ज़रूरत नहीं है।“ सुमन ने कहा।
“हाँ माँ मुझे पता है। पर क्या करूँ?” सुवीर ने धीरे से कहा।
“अच्छा-अच्छा…अब तू आराम कर…वहाँ तो रात होगी न?” सुमन ने पूछा।
“हाँ…माँ…ठीक है…बाय…अपना ध्यान रखना” सुवीर ने कहा।
“बाय…बेटा…तुम भी अपना ध्यान रखना”
फोन कट चुका था लेकिन सुमन जी रिसीवर हाथ में पकड़े मानों जड़ हो गयी थीं। न जाने किन ख्यालों में खोई सुमन जी का ध्यान तब भंग हुआ जब दीप्ति ने चाय का प्याला उन्हें पकड़ाते हुए उनके हाथ से रिसीवर ले लिया।
“भइया का फोन था?” चाय की चुस्की लेते हुए दीप्ति ने पूछा।
“हाँ…” सुमन ने आँखों में आए आँसू छुपाते हुए उत्तर दिया।
“फिर वही कहा होगा कि वीज़ा की अनुमति नहीं मिल रही है…है न?” दीप्ति ने थोड़ा चिढ़ कर कहा।
सुमन ने कोई जवाब नहीं दिया। चाय का प्याला हाथ में पकड़े वह चुपचाप बैठी रही।
माँ की भावनाओं को समझते हुए दीप्ति ने बहुत प्यार से कहा, “आखिर तुम समझतीं क्यों नहीं मम्मी, अगर भैया को तुम्हें ले जाना होता तो कोई-न-कोई रास्ता ज़रूर निकालते तुम्हें ले जाने का…वह तो खुद नहीं चाहते कि…” सुमन की आँखें भर आईं, “ओह्हो…अरे मम्मी इसमें रोने की क्या बात है? यहाँ तुम्हें किस बात की कमी है? मैं भी तो तुम्हारी औलाद हूँ…क्या मैं तुम्हारी देखभाल नहीं कर सकती? मैं समझती हूँ तुम्हारा दुःख…लेकिन जब भइया को ही अहसास नहीं है तो…” दीप्ति ने सुमन के कंधे पकड़ते हुए कहा।
“उसे अहसास है…पर पता नहीं क्यों…” कहकर सुमन ज़ोर से रो उठी।
दीप्ति बात आगे न बढ़ाकर उन्हें चुप कराने लगी कि तभी देवेन्द्र भी वहाँ आ गये।
“क्या हुआ…मम्मी जी रो क्यों रही हैं? क्या सुवीर ने…” देवेन्द्र ने पास बैठते हुए पूछा।
दीप्ति ने देवेन्द्र को चुप रहने का इशारा किया कि तभी सुमन उठ गयीं और अन्दर कमरे में चली गयीं।
देवेन्द्र ने अखबार उठाया ही था कि दीप्ति बोल पड़ी, “मम्मी को देखकर कभी-कभी बहुत दुःख होता है। बेचारी भइया के पास जाने को तड़प रही हैं और भइया हैं कि…”
देवेन्द्र ने अखबार के पन्ने के पलटते हुए कहा, “यही माँ की ममता है। मैंने तो सुवीर को बहुत कहा कि हमेशा के लिए न सही तो कुछ ही समय के लिए मम्मी जी को ले जाए…अरे खर्चा मैं कर दूँगा। कम से कम उनका मन तो लग जाएगा लेकिन सुवीर ने यह कहकर साफ मना कर दिया कि सोनाली नहीं चाहती मम्मी यहाँ आएँ। हद है यार…अपनी माँ के साथ कोई यह कैसे कर सकता है?”
“कभी-कभी तो लगता है कि मम्मी को सच बता ही दूँ कि जिस बेटे के लिए तुम तड़प रही हो, वह अपनी बीबी का गुलाम है और तुम्हें लेकर नहीं जाने वाला, उसका इंतज़ार मत करो…लेकिन नहीं कह सकती…मेरी भी तो माँ है वह…” दीप्ति ने कहा।
“नहीं…नहीं…ऐसा मत कह देना कभी…दिल टूट जाएगा उनका। कोशिश करो कि वह हमारे यहाँ खुश रहें।…अच्छा चलो मैं थोड़ा ज़रूरी काम से बाहर जा रहा हूँ…तुम्हें कुछ मँगवाना हो तो फोन कर देना” देवेन्द्र ने उठते हुए कहा, “और हाँ…मम्मी जी को लेकर थोड़ा बाहर घूम आना…बहुत उदास होंगी आज।”

सुमन का मन बहुत भारी होने लगा। कमरे में पलंग पर लेट कर सुबकने लगीं। उनके स्मृतिसिंधु में ज्वार आया हुआ था जिसकी बूंदें उनकी आँखों में रह-रहकर छलक रहीं थीं। सुवीर बारहवीं की परीक्षा में पूरे नगर में प्रथम आया था और उन्होंने रामचरितमानस का अखंड पाठ रखा था। सारे नाते-रिश्तेदारों को और पास-पड़ोस के लोगों को बुलाया था। बहुत बड़ी दावत दी थी। सबने सुमन के हौसले की प्रशंसा की। सुवीर के पिताजी तो अपनी पिचहत्तर वर्षीया माँ के साथ पाँच साल के सुवीर और एक साल दीप्ति को छोड़कर स्वर्ग सिधार चुके थे। उनके जाने के बाद न जाने किस-किस ने झूठी सहानुभूति जताई और सुमन का गलत फायदा उठाने की कोशिश की। अनेक लोगों ने यहाँ तक कि खुद उसके मायके वालों ने उसे दूसरी शादी करने की सलाह तक दे डाली। लेकिन सुमन ने भारतीय नारी की छवि को धूमिल नहीं किया और अपने पवित्र दामन पर किसी भी प्रकार का दाग नहीं लगने दिया। अकेले ही सारी भागदौड़ करके सुमन ने उनकी नौकरी को पाया। नौकरी के साथ-साथ और बच्चों और बूढ़ी सास की परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी। बयासी वर्ष की उम्र में सास ‘जुग-जुग जियो’ और ‘सदा सुखी रहो’ के दो अनमोल मोती उसकी दोनों कानों में बालियों के रूप में देते हुए परलोकवासी हो गयीं। सुमन ने सुबकते हुए अपने कानों की बालियों को छूकर सास के झुर्रियों वाले हाथ स्पर्श महसूस किया। सास के मरने के बाद थोड़ी मुश्किल आई क्योंकि सुवीर पढ़ने के लिए नोयडा चला गया और जवान होती दीप्ति को घर एक अकेला छोड़ना समझदारी की बात नहीं थी। अतः उसने अपने ही विभाग में उसके साथ कार्यरत इलाहाबाद की सुनीता को अपने घर में किराए पर रख लिया। सुनीता भी अपने पति की मृत्यु के बाद उनकी जगह पर काम कर रही थी। उसके तीन बच्चे थे दो बड़ी लड़कियाँ और एक छोटा बेटा। सुनीता की दोनों लड़कियों ने दीप्ति का बहुत ध्यान रखा। सेवानिवृत्ति तक सुनीता अपने छोटे से परिवार के साथ उसी के साथ रही फिर इलाहाबाद चली गयी। दीप्ति की शादी के समय सुनीता पन्द्रह दिन पहले ही सुमन का हाथ बँटाने आ गयी थी। पूरी शादी में एक टाँग पर खड़ी रही थी। सुमन के मन में सुनीता और उसके बच्चों के लिए अपार श्रद्धा और स्नेह उमड़ पड़ा जो फिर से आँसू के रूप में आँखों से बहकर उसके गालों को गीला कर गया। उसे याद आया कि सुवीर ने नोयडा से फोन किया था कि उसने एम टेक में गोल्ड मैडेल हासिल किया है और उसे अमेरिका जाने का मौका मिल रहा है। कुछ भी करके उसे अमेरिका भेजने की व्यवस्था करनी अनिवार्य है। खर्चा भी बहुत होना था और उसके पास कुल मिलाकर दो तीन लाख रूपये ही रह गये थे। फंड से लोन ले-लेकर सुवीर की एमटेक तक की पढाई और फिर दीप्ति की शादी इस सब में ही उसका सारा पैसा खत्म हो चुका था। फिर भी उसने हिम्मत नहीं हारी। शादी के समय अपनी माँ के दिये नौलखे हार को बेचकर उसने सुवीर को अमेरिका भेजा। अमेरिका जाने के दो साल बाद सुवीर वापस आया और सुमन से कुछ और पैसों की माँग की लेकिन अब सुमन के पास नौकरी की पेंशन के अलावा कुछ नहीं बचा था। लेकिन सुवीर ने रो-रोकर उसे बताया कि अगर रुपयों की व्यवस्था नहीं हो पाई तो उसकी सारी पढ़ाई, अमेरिका की नौकरी और वहाँ इज्जतदार जिन्दगी सबकुछ मिट्टी में मिल जाएगा। मरता क्या न करता, सो सुमन ने अपने पति के मकान की कीमत लगवा दी और सारा पैसा सुवीर को दे दिया। सुवीर ने सुमन को दीप्ति और देवेन्द्र के घर में केवल कुछ दिनों के लिए ठहराते हुए कहा कि अमेरिका में अपना घर लेते ही तुम्हें वहाँ बुला लूँगा। लेकिन पिछले दो सालों से सुवीर ने पलटकर सुमन की खबर नहीं ली। केवल उन्हें फोन ही करता रहा कि माँ तैयारी कर लो अगले महीने की दस तारीख को तुम्हें लेने आ रहा हूँ। फिर हर महीने की पाँच या सात तारीख को उसका फोन आता कि माँ तुम्हारे वीजा में थोड़ी गड़बड़ होने के कारण फिर से आवेदन किया है। अब अगले महीने ही कुछ हो पाएगा। और सुमन अगले महीने का इंतज़ार करने लगती। ऐसा करते-करते पूरे दो साल हो चुके थे। सुवीर की ओर से दी जाने वाली झूठी तसल्ली अब उनकी समझ में आ रही थी। सुमन का मन डूबने लगा था। आँखें फिर भर आईं थीं।
“मम्मी यहाँ अकेले क्या कर रही हो?” दीप्ति की आवाज़ ने सुमन को एकदम चौंका दिया।
“अँ…क…कुछ नहीं…आओ बैठो बेटा…दामाद जी गये क्या?” पलंग से उठकर अपनी आँखें पोंछते हुए सुमन ने कहा।
“यह क्या…फिर रो रहीं थीं…क्या मम्मी…क्यों रोती हो उसके लिए…यहाँ तुम्हें क्या कोई दिक्कत है या…” दिप्ति ने ऐसे कहा जैसे किसी छोटे बच्चे से कह रही हो।
“अरे नहीं पगली…दिक्कत कैसी? तू भी तो मेरी औलाद है…और फिर देवता जैसे दामाद को पाकर मुझे तो जैसे स्वर्ग मिल गया है। लेकिन बेटा…बेटी दामाद के घर रहना माँ-बाप के लिए शोभा नहीं देता। लोग क्या कहेंगे?” सुमन ने बहुत प्यार से कहा।
“क्या…कैसी बातें कर रही हो मम्मी? किस ज़माने में जी रही हो? आज दुनिया बेटा-बेटी में फर्क नहीं करती और तुम…” दीप्ति एकदम से बोल उठी, “मुझे मालूम है माँ कि तुमने भइया और मेरी परवरिश में कोई कसर नहीं छोड़ी है…मुझे मालूम है हम दोनों को पढ़ाने और किसी काबिल बनाने में तुमने अपनी पूरी ज़िन्दगी लगा दी। हमें अच्छा खाने-पिलाने में खुद अपना तन-पेट काटा है तो क्या अब हमारा फर्ज़ नहीं कि तुम्हारी देखभाल करें? अरे माँ हर माँ-बाप अपने बच्चों हर ख्वाहिशें इसलिए पूरी करते हैं कि बुढ़ापे में वह उनका सहारा बन सकें। फिर इसमें लड़का-लड़की का भेद कहाँ से आ गया?” दीप्ति कह रही थी, “अनीता आंटी के तो केवल दो लड़कियाँ ही हैं…वह भी तो छह महीने बड़ी बेटी और छह महीने छोटी बेटी के यहाँ रहती हैं। मेरी मानों तो…” दीप्ति कह ही रही थी कि सुमन बोल उठीं, “तुमने बताया क्यों नहीं कि सुवीर मुझे ले जाना नहीं चाहता…” दीप्ति का मुँह खुला रह गया। वह एकदम चौंक-सी गयी, “व…वह…तो…क्या तुमने हमारी…बातें…” “हाँ…सुन लीं…।” सुमन पलंग से उठीं और बाथरूम में जाकर मुँह धोने लगी। पीछे से दीप्ति भी आ गयी और उनकी पीठ पर झुक गयी, “आई एम सारी मम्मी…मैं तो तुम्हें बताना चाहती थी लेकिन देवेन्द्र ने ही मना कर दिया। वह तुम्हारा दिल दुखाना नहीं चाहते इसलिए…” दीप्ति को ध्यान आया कि अपने कमरे में जाते-जाते सुमन ने दीप्ति और देवेन्द्र की बातें सुन लीं थीं।
सुमन ने बिना कुछ बोले उसे खुद से अलग किया और तौलिया से मुँह पोंछते हुए वापस कमरे में आ गयी। दीप्ति पीछे-पीछे उन्हें मनाते हुए वैसे ही चल रही थी जैसे बचपन में सुमन दीप्ति के पीछे चला करती थीं, “अरे मेरी माँ…मान भी जाओ…सॉरी…रियली वैरी सॉरी…कान पकड़कर सॉरी।” सुमन कमरे में आई और अलमारी से बड़ा-सा बैग निकाला। दीप्ति एकदम चौंक गयी, “क्या कर रही हो मम्मी?”
“कुछ नहीं…” कहकर वह बैग से कपड़े निकालकर फिर से अलमारी में हैंगर पर टाँगने लगीं। फिर बैग में से एक सुन्दर सी साड़ी निकालकर दीप्ति को देते हुए बोली, “शाम को मंदिर चलेंगे तो तू यह साड़ी पहनना।”
साड़ी देखते ही दीप्ति को याद आया कि मम्मी ने बनारस से यह साड़ी से भाभी के लिए खरीदी थी। साड़ी दीप्ति को भी बहुत पसन्द आई लेकिन मम्मी ने कहा था कि यह मैं अपनी बहू को दूँगी। इस बात को लेकर सुमन और दीप्ति में थोड़ी झड़प भी हो गयी थी। पिछले तीन साल से सँभाली जा रही वह साड़ी अब वह उसे दे रही थीं। साड़ी को सीने से लगाकर दीप्ति रुआँसी होकर सुमन से लिपट गयी, “ओ…मम्मी…इसका मतलब तुम यहीं…” “हट पगली…अपनी बेटी को छोड़कर कहाँ जाऊँगी?” सुमन का स्वर भी गीला था।

– डॉ. लवलेश दत्त

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