मेरे घर तुम जो ‍आओ

मेरे घर तुम जो ‍आओ तो ये एहतमाम हो जाये।
मेरा ये गरीबखाना भी दारुल सलाम हो जाये।।

ज़रूरी है अग़र पर्दा तो पर्दा हो लतीफ़ इतना।
तुम्हारी हो न रुसवाई, मेरा भी काम हो जाये।।

मेरी सांसें महक जाएँ नशे में झूम लूँ मैं भी।
तुम्हारे लब का पैमाना जो मेरा जाम हो जाये।।

मेरा सर गोद में लेकर हवा आँचल से कर दे तू।
मोहब्बत के रिसाले में मेरा भी नाम हो जाये।।

मेरी गजलों के लफ्जों को जरा सा गुनगुना ले तू।
मेरी खातिर मेरे हमदम यही ईनाम हो जाये।।

हमारे प्यार का चर्चा ज़माने भर में हो जानां!
तुम्हारा नाम हो राधा हमारा श्याम हो जाये।।

– निपुण शुक्ला

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