तू कर ले कोशिश जो दूर जाने की
पास आने की राह ढूंढ जाऊँगी

तू अगर धागों को तोड़ना चाहे
मैं रिश्तों की मोती पिरों जाऊँगी

कभी थोड़ी स्याह जो लगी जिन्दगी
मैं रंगों से झोली को भर जाऊँगी

जो तु अगर हो गया नीम तो
मैं बनके मिशरी पिघल जाऊँगी

तू जो मुझे चाहे है भूलना
सासों कि रवानगी मैं बन जाऊँगी

अगर दुःख के बादल आये तेरे गाँव
मैं ठंडी पुरवाई संग लाऊँगी

तू जो अगर मुझसे दूर हो गया तो
मैं टूट कर फिर बिखर जाऊँगी

मैं बनके साया हूँ लिपटी हुयी
तुझसे जुदा मैं न हो पाऊँगी।

लेखक / लेखिका – डॉ. वंदना मिश्रा

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