अंडमान यात्रा की डायरी से कुछ पन्ने

जब मैनें अपनी अंडमान यात्रा की शुरुआत की थी तो मेरे मित्र पूर्व समाचार वाचक श्री नवनीत मिश्र की एक बात मुझे याद आ गई जिसे आपसे शेयर करना चाहूंगा।उन्होंने कहा था कि हर भारतीय को अपने जीवन में एक बार सेल्यूलर जेल अवश्य देखनी चाहिए जिससे वह जान सके कि देश को आज़ादी सेंती(मुफ़्त)में नहीं मिली है।हमारे आज़ादी के दीवानों ने कितनी और कैसी – कैसी यंत्रणाओं को झेला है।इस जेल को देखकर और इस पर बने लाइट और साउन्ड कार्यक्रम को सुनकर मन आकुल- व्याकुल हो उठता है।कदाचित अंग्रेज़ी हुकूमत द्वारा की गई बर्बरता के ख़िलाफ भी।अंग्रेजी सरकार द्वारा भारत के स्वतंत्रता सेनानियों पर किए गए अत्याचारों की मूक गवाह इस जेल की नींव 1897 में रखी गई थी। इस जेल के अंदर 694 कोठरियां हैं। इन कोठरियों को बनाने का उद्देश्य बंदियों के आपसी मेल जोल को रोकना था। आक्टोपस की तरह सात शाखाओं में फैली इस विशाल कारागार के अब केवल तीन अंश बचे हैं। कारागार की दीवारों पर वीर शहीदों के नाम लिखे हैं।जेल के सामने शहीद पार्क में उन 6महान क्रान्तिकारियों की मूर्तियां देखी जा सकती हैं जिन्होंने” जान जाय पर आजादी की मांग न जाय” के लिए अपनी कुर्बानी दे दी।वे हैं- शहीद इन्द्र भूषण राय,सरदार भान सिंह,पंडित राम रक्खा,महावीर सिंह,मोहित मित्रा और मोहन किशोर नमो दास। यहां एक संग्रहालय भी है जहां उन अस्त्रों को देखा जा सकता है जिनसे स्वतंत्रता सेनानियों पर अत्याचार किए जाते थे।यहां विनायक दामोदर सावरकर भी क़ैद थे जिन्होंने हिंदुस्तान की आजादी के लिये अपने जीवन को कुर्बान कर दिया ।ब्रिटिश राज में काला पानी की इस जेल का इतना खौफ था जितना कि फांसी या गोली मार देने का नही था । एकांत कारावास ही एकमात्र यातना नही थी उससे भी बडी यातना थी कोल्हू तेल की घानी । बंदियों से जो काम यहां पर कराये जाते थे उसमें से यह सबसे कठिन काम था । इसके कारण कई बंदी मर गये और कई का मानसिक संतुलन खराब हो गया । कोल्हू के बैल की तरह इसमें बंदियो को जोता जाता था । इससे मना करने पर उन्हे बैल की तरह ही डंडे से बांधकर पिटाई की जाती थी । इस कोल्हू की घानी के कारण ही इस जेल में विद्रोह हो पाया ।जहां पर इन दिनों लाइट और साउंड शो दिखाया जाता है उसी स्थल पर कोल्हू की घानी के अलावा नारियल की रस्सी बुनना , रस्सी बनाना , छिलके कूटने जैसे और भी काम थे जिन्हें कैदियों को निर्धारित समय व लक्ष्य के साथ पूरा करना पड़ता था । जो कैदी विरोध करते थे उन्हे तिरस्कृत कोठरी में रखा जाता था । मौत की सजा पाये कैदियो को भी फांसी की सजा हो जाने तक इन कोठरियो में रखा जाता था । इन कोठरियो के सामने ही फांसी घर था और वे कैदी सिर्फ फांसीघर को ही देखते रहते थे । वीर सावरकर को भी ऐसी ही तिरस्कृत कोठरी में रखा गया था । उस वीर शहीद की कोठरी को देखने के बाद कठोर से कठोर हृदय भी भावुक हो जाते हैं।अभी पिछले महीनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस कोठरी में जाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त की थी। कालापानी सम्बोधन देशनिकाला का पर्याय था । ऐसा स्थान जहां से एक बार जाने के बाद कोई वापस नही आ सकता था ।उसे भले फांसी ना मिले पर उसे वहीं पर मरना था । उस जमाने में इस द्वीप पर पहुंचना भी बहुत मुश्किल था और केवल सरकारी पानी के जहाज से ही कोई जा सकता था जो कि सरकारी नियंत्रण में थे । यहां पर बंदियो को इसलिए भी रखा गया क्योंकि इससे ब्रिटिशों को दो फायदे होने वाले थे । तूफान में फंसे या यात्रा में रुकने के लिये ब्रिटेन से आने वाले जहाजो को यहां पर रुकाया जा सकता था ,पर तभी ,जब कोई स्थायी बस्ती इस द्वीप पर रहती हो। उन दिनों यहां पर कोई भी रहने के लिये तैयार नही था जो बंदियो को लाने की वजह से संभव हो पाया । बंदी आये तो उनको संभालने के लिये सैनिक , जेलर और अन्य कामो के लिये ब्रिटेन और भारत के लोगो को लाया गया और बन गयी यहां पर स्थायी बस्ती । जब तक इसका निर्माण नहीं हुआ था कैदियों को चाथम द्वीप के सा मिल परिसर में रखा गया ।
सबसे पहले 200 स्वतंत्रता सेनानियो को यहां पर लाया गया । एक क्रूरतम सजा में यहां के बंदियो पर और ज्यादा अत्याचार करने के लिये चेन गैंग बनाया गया । इसमें कई कैदियो को एक चैन से दिन रात बांधकर रखा जाता था । बताते हैं कि कैदियों की संख्या ज्यादा होने पर वाइपर और रोज द्वीप पर भी जेलो का निर्माण कराया गया । एक बार यहां से दो सौ से ज्यादा कैदियो ने भागने की कोशिश की जिनमें से ज्यादतर कैदी भागने की कोशिश के दौरान मर गये और जो पकड़े गये उन सभी को एक ​ही दिन और समय में फांसी पर लटका दिया गया । कई बार तो यहां के आदिवासियो ने इन बस्तियो पर आक्रमण किया और उसमें भी बंदी ही मारे गये । कई सालो के बाद थोड़ी बहुत हड़ताल की शुरूआत हुई और उसके बाद जब अंडमान के ​यातनाओ के किस्से बाहर आने लगे तो विरोध प्रदर्शनो की भी शुरुआत हो गयी । हड़ताल को खत्म कराने के लिये उन सभी के मुंह में जबरदस्ती खाना ठूंसा गया लेकिन फिर भी कई राजनीतिक बंदियो की मृत्यु हो गयी । बहुत विरोध प्रदर्शनो के बाद कहीं जाकर वहां से ब्रिटिश सरकार ने वहां से बचे हुए रा​जनीतिक बंदियो को वापस बुला लिया । तब जाकर ये देश निकाला प्रथा समाप्त हुई ।
……यात्रा के इस दिवस की शाम ढल चुकी थी,रात उतरने लगी थी।हम लोग अब वापस होटल आ गये और रात का भोजन लेकर नींद की बाहों में चले गये।नींद …लेकिन आज नींद आ क्यों नहीं रही है..शायद अब भी सेल्यूलर जेल के भयानक बैरक और यातना गृह ज़ेहन में हैं !
अपने जीवन की यह एक और नई सुबह थी ,एक बेहद खुशनुमा मौसम में हम अंडमान की धरती पर विचरण कर रहे थे,क़ैदी बन कर नहीं.. सैलानी बन कर ।आज हमें लोकल पर्यटन स्थल देखने हैं।
■समुद्रिका:नवल मैरीन म्यूजियम
पोर्ट ब्लेयर की घूमने वाली एक जगह है।वयस्क के लिए पचास रुपये का टिकट है।मैरीन एक्वैरियम कक्ष के अलावे फोटोग्राफी की जा सकती है।
■गवर्मेन्ट सा मिल:चाथम
प्रदेश के पर्यावरण और वन विभाग के नियंत्रण में काम कर रही इस सा मिल का ऐतिहासिक महत्व रहा है।इसका प्रवेश शुल्क दस रुपये है और यदि आपको गाइड लेना है तो उसका शुल्क अलग है।इसका इतिहास सेल्युलर जेल बनने से भी पहले का है।यह पहले निजी स्वामित्व में था अब सरकारी।पहले चाथम आइलैन्ड हुआ करता था किन्तु द्वितीय विश्व युद्ध में जब इस पर भी बमबारी हुई तो यह क्षतिग्रस्त हो गया ।अब एक पुल के जरिये यह शहर से जुड़ा है। यहां नेताजी सुभाष चन्द्र बोस भी आजादी से पहले आ चुके हैं।इसी परिसर में शुरुआत में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बन्द आन्दोलनकारियों को लाया गया था। फिर उन्हें सेल्युलर जेल बनने पर शिफ्ट किया गया।अब भी इस मिल में हजारों लोग काम करते हैं।इसके चारो ओर समुद्र है।मनोरम दृश्य है।
अंडमान प्रवास (पोर्ट ब्लेयर)में शाकाहारी भोजन की सुलभता कम है।लेकिन हमने एक शुद्ध शाकाहारी पंजाबी ढाबा ढूंढ़ लिया जो कम लोकप्रिय है।उचित मूल्य पर भरपेट भोजन सुलभ हुआ।अगली सुबह हैवलाक द्वीप की तैयारी थी।वही हैवलाक जहां कुछ साल पहले भारी बरसात और तूफान के चलते कुछ दिन पर्यटक फंस गये थे और जो काफ़ी सुर्खियों में भी रहा था ।

प्रफुल्ल कुमार त्रिपाठी

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