सुबह वाला चाँद…

सुबह वाला चाँद…

वही गगन है वही पवन है
मगर ये कौन है जो है
उदास हैरान परेशान……
क्या मैं देख रही हूँ मेरा सुबह वाला चाँद
मैंने पूछा चाँद दिन में तुम यहाँ क्या करते हो
कहाँ है तुम्हारी चाँदनी
चाँद ने कहा मेरी खो गई है चाँदनी
जीवन से दूर हो गई है रागनी
मुझे मेरी चाँदनी से मिला दो
ना जाने कहाँ है वो बता दो
ना जाने कहाँ खो गई है
शायद किसी और की हो गई है
मैं देख रही हूँ सुबह वाला चाँद
उदास हैरान परेशान……
मुझसे चाँद ने कहा मैंने तुम्हें चाँदनी में उदास देखा है.
आज मैं उदास हूँ क्या आज तुमने मेरी चाँदनी को कहीं देखा है
देखो सूरज भी अपनी लालिमा फैला रहा है..
सूर्य किरणों का ताप मुझसे सहा नहीं जा रहा है.
तभी सहसा बादलों की आड़ से नर्म चाँदनी निकली
चाँद ने कहा तुम कहाँ खो गई थी
मेरी तो जैसे किस्मत ही सो गई थी
मेरी बुढ़िया भी तुम बिन उदास है
उसको भी तुझसे बिछड़ने का त्रास है
मैं देख रही हूँ सुबह वाला चाँद
उदास हैरान परेशान……
चाँदनी बोली मैं रात प्रेमियों पर प्रेम रस बरसाती हूँ
सोचा देखूँ क्या दिन में भी मैं इनको इतना ही भाती हूँ
पर ये प्रेमी दिन में मुझे भूल जाते हैं और सूर्य किरणों में खो जाते है
पर चाँद मेरे मैं तुमसे दूर कभी ना जाऊंगी
कहीं भी रहूँ अंत तुझमे ही समा जाऊँगी
दोनों एक दूसरे की आगोश में खो गए
सदा के लिए एक दूसरे के हो गए
अब मैंने देखा मेरा वही प्यारा चाँद
चाँदनी रस में नहाया हुआ
अपने प्रेम पर इतराया हुआ
हाँ अब मैं सुबह देख रही हूँ मेरा रात वाला चाँद….:)

लेखक / लेखिका – दीप्ति श्रीवास्तव….

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