जब भी कविता लिखती हूँ

जब भी कविता लिखती हूँ
जाने क्यों मेरा कवित्व मर जाता है
एक आम सा अदना इंसान
मेरे भीतर भर जाता है
जिसे न तो काव्यांगों का ज्ञान है
न रूपकों ,अलंकारों का भान है
बस सादी सी खुशियाँ हैं
और गहरी गहरी पीड़ाएँ हैं
उसकी समस्याएं बड़ी अक्खड़ हैं
इन रुक्ष समस्याओं पर भला
काव्य रस कैसे रचेगा
अब भूख,प्यास,गन्दगी
अपराध ,मंहगाई
नशाखोरी,बलात्कार
पर कोई प्रतिमान कैसे सजेगा
सो जब भी लिखने बैठूँ
सारी फंतासियां खो जाती हैं
और सूखा सच रह जाता है
मेरा पद्य गद्य के साथ गड्ड-मड्ड हो
लयभंग का शिकार हो जाता है।
लेखक / लेखिका  : तनूजा उप्रेती

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