आखिर क्यों

अपनी ही दुनिया ख़राब करने वाले को मन ,
अपना समझता है, पूरा समंदर पार करने के बाद
किनारे पर आकर दम निकल जाता है,आखिर क्यों

खुद के संग फरेब करने वाले को हम ,
अपने अंदर समां लेते है, सब समझते हुए
भी उसकी ओर मन नासमझ होना चाहता है,आखिर क्यों,

अपनी सुद भूल मन उसी के लिए दुवाएँ मांगने लगता है,
खुद कि ख़ुशी से ज्यादा मन उसकी ख़ुशी मैं नाचता है ,
जिसे आपकी परवाह नहीं, मन उसकी ही परवाह चाहता है, आखिर क्यों,

आखिर क्यों, आखिर क्यों, आखिर क्यों

लेखक / लेखिका : दीपक

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