प्यार नहीं है

कहती हूँ प्यार नहीं मुझे उससे ,
पर क्यों परेशां रहती हूँ,

कहती हूँ नहीं करनी मुझे उससे बातें,
पर क्यों उसी के बातें सोचती हूँ ,

कहती हूँ, खुश रहो अपनी दुनिया में तुम और मैं,
पर अपनी दुनिया में उसकी कमी लगती है,

सोचती हूँ दूर रहना ही अच्छा है,
फिर पास रहने को मन चाहता है,

नहीं चाहती तन का मिलन,
बस मन का मिलन मन चाहता है,

पर फिर भी यही कहना है
प्यार नहीं है , नहीं है , नहीं है||

लेखक / लेखिका : दीपक

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