मन

हे मन के चँचल परिन्दों
बहुत दिनों मे आये तुम ।।

तुम जो नहीं थे
जड आँखों की सुखी थी
दिल की डाल पर,
कोई बसेरा डाल सका
रात का सपना भूल गया।
कोई सवेरा पाल सका ना

जिस नगरी में हम हारकर आये
उस नगरी से क्या लाये तुम ।।

इस तरफ जब छुपता सूरज
दूजी और निकलता होगा।
मुझको क्या हक ,
जो दोष तुझे दूँ ,
किसमत का लेखा जोखा है
किस- किस ने भुगता होगा ।

ओ मन के बेईमान परिन्दों
किस को छल कर आये तुम ।।

लेखक / लेखिका : अवधेश तोमर

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