प्यासा हूँ

प्यासा हूँ बहुत,
व्याकुल हूँ प्यास से।
साल का एक एक कंकर डाल रहा हूँ
हर साल बड़ी आस से;
इस उम्र के मटके में –

की पानी की सतह ज़रा उभरें
तो रूह पानी पी सकें सुकून से …

यहां अक्सर लोग पानी पिलाते है
सिर्फ जिस्म को (वो भी समय निकलने के बाद)
और रूह प्यासी ही मर जाती है |

या मटकी फोड़ देतें है कह कर – राम नाम सत्य है !

लेखक / लेखिका : संतोष कदम

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