इंतज़ार

“वो” धूप में खड़ा रहकर ताउम्र जलता रहा
रात में जागकर नींदे उजाड़ता रहा
कभी बस स्टॉप, कभी रेलवे स्टेशन पर मंड़राता रहा
तो कभी डाक घर के आसपास टहलता रहा

ना समय पे खाना, ना समय पे पीना
आखिर बीमार हो गया तो ठीक से इलाज भी ना कर पाया

आय सी यु में जब आखरी साँसे ले रहा था
मेरा “इंतज़ार” ;

तो मै यही दुआ कर रहा था की
यूं तड़पने से अच्छा है, की बेचारा छूट जाय

लेकिन मेरा “इंतज़ार” अब भी कोमा में पड़ा है बरसों से
किसी के इंतज़ार में ….

मै दफ़न कर देना चाहता हूँ , मेरे इंतज़ार को
मुझे उसकी असहायता अब बर्दाश्त नहीं होती

लेकिन डॉक्टर कहते है –
“वो मरा नहीं अब तक ….
हमारे पेशे में भी चमत्कार होते है कभी कभी
ऊपरवाले पे भरोसा रखो”

लेखक / लेखिका : संतोष कदम

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