यात्रा

कर ली यात्रा चार धाम की
करके हज बन गया हाजी
पार किया वह लंबा रस्ता
करी ना दूरी तय जरा सी
इतने लंबे जीवन सफर में
घूम रहा बन घोड़ा हाथी
ढो बोझ ये झूठे अहम का
चलेगा कब तक मेरे साथी
आवागमन तो अनंत किये है
मिली क्या तुझको चैन जरा भी
लगा विराम अब आवागमन पर
बाँच ले खुद से खुद की पाती

रुमा जैन

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