पटना के घाट पर बैठे शैलेन्द्र ने जब पैर पानी में डाला तो लगा जैसे हजार बिच्छुओं ने एक साथ डंक मार दिया हो। पानी तीर की तरह चुभ रहा था। शैलेन्द्र ने पैर बाहर खीच लिया। एक जमाने में शैलेन्द्र के सारे सपनों के गवाह रहे पटना के इस घाट पर आज वे पुरे चार साल बाद आये थे।
दुनिया जिस घाट पर एक बार डुबकी लगा कर अपने सारे पाप धोने का प्रयास करती है, एक जमाने में वहां बैठ कर शैलेन्द्र और कविता ने अपने जीवन के सारे खूबसूरत सपने देखे थे। सप्ताह के सात दिनों में पांच दिनों की शाम दोनों इसी घाट पर गुजारा करते थे। कविता पटना अनुग्रह नारायण महाविद्यालय पढ़ती थी और शैलेन्द्र छपरा महाविद्यलय में। इस घाट पर बैठना कविता को बहुत पसंद था, सो वह लगभग रोज ही घाट पर आ जाती और पता नही किस तेजी से शैलेन्द्र भी पहुच जाते थे। छपरा से पटना की दुरी इतनी कम भी नही है, कि कोई आदमी रोज चले जाने की सोचे भी, पर कविता का स्नेह रोज शैलेन्द्र को खीच ले जाता था।
कविता और शैलेन्द्र दोनों मूलतः बिहार के गोपालगंज जिले के थे। कविता के घर उसके भाई की बारात में गए शैलेन्द्र ने पहली बार वहीं देखा था कविता को, वे इंटरमीडियट के दिन थे। गांव की शादियों में आज से आठ दस साल पहले तक एक नियमित नौटंकी होती थी। जब दूल्हे को कपडा पहनाने के समय टाई बांधने का समय आता तो घर से लेकर बाहर तक टाई बांधने की योग्यता रखने वाले की खोज शुरु हो जाती थी। तो उस दिन टाई बांधने की योग्यताधारी के रूप में शैलेन्द्र कविता के आँगन में आये और इसके बदले में उन्हें कविता की दोस्ती इनाम में मिली। यह दोस्ती कब दोस्ती से अच्छी दोस्ती, और अच्छी दोस्ती से प्यार में बदल गयी यह न शैलेन्द्र तिवारी को पता चला न ही कविता मिश्रा को, दोनों बस यह समझ पाये कि वे एक दूजे का हाथ पकड़ कर चलते हुए ही सबसे ज्यादा ख़ुशी पाते हैं।
कविता को पढाई के बाद दो काम सबसे अच्छे लगते थे, पहला- पटना में गंगा के घाट पर बैठ कर मछलियों को आटे की गोलियां खिलाना, और दूसरा- शैलेन्द्र से चइता गवाना। और शैलेन्द्र के जो दो पसंदीदा काम थे वे थे, कविता के साथ घूमना, और कविता के साथ घूमना।
शैलेन्द्र का गला बहुत सधा हुआ था और वे बहुत अच्छा गाते थे। जब भी कविता गाने को कहती तो शैलेन्द्र इतना टूट कर गाते, कि लगता जैसे उनका गाना सुनने के लिए वक्त ठहर गया हो। कई बार भादो के महीने में शैलेन्द्र को चइता गाते सुन कर घाट पर टहलने वाले लोगों ने मजाक उड़ाया, पर शैलेन्द्र के लिए तो कविता की इच्छा ही सबसे ऊपर थी।
दो वर्ष बीत गए। अब शैलेन्द्र और कविता के सपनों ने बड़ा आकार लेना शुरू कर दिया था। गंगा के इसी घाट पर बैठ कर दोनों ने एक दिन तय किया कि अब बात अपने घरवालों को बता दी जाय। अगले दिन से कविता के कॉलेज में छुट्टी हो रही थी, सो दोनों ही अपने अपने घर चले आये। गांव के लड़के लड़कियां सामान्यतः अपने प्रेम की बात अपने घरवालों से नही बता पाते, पर कविता और शैलेन्द्र को उनके प्रेम ने बहुत शक्तिशाली बना दिया था। घर आने के साथ ही दोनों ने अपने घरवालों से अपनी बात कह दी थी। शैलेन्द्र अपने परिवार के दुलारे थे और किसी को उनकी आँखों में आंसू देखना गवारा नही था, सो थोड़े से प्रश्नों के बाद सभी मान गए, पर कविता के साथ वही हुआ जो भारतीय समाज सामान्यतः करता आया है। जो अधिकार हम अपने बेटों को यूँ ही दे देते हैं, वही अधिकार बेटियों को देने में हमारी इज्जत जाने लगती है। कविता के पिता को शैलेन्द्र पसंद थे, यदि अपनी मर्जी से यही विवाह वे स्वयं तय करते तो दस लाख दहेज़ देने के बाद भी खुद को भाग्यशाली समझते, पर यहां तो बेटी ने प्यार कर के शैलेन्द्र के चरित्र पर धब्बा लगा दिया था। पुरे घर ने यह प्रस्ताव नकार दिया। नए नए बहाने खोजे जाने लगे। इतने नजदीक में शादी नही हो सकती, तिवारी लोगों का गोत्र हमलोगों से अच्छा नही होता, लोग क्या कहेंगे वगैरह वगैरह… पूरी छुट्टियों में कविता ने अपने परिवार को मनाने का सारा प्रयास कर लिया पर कोई फायदा नही हुआ।
छुट्टियों के बाद जब फिर शैलेन्द्र और कविता मिले तो कविता ने सब बताया और चुपचाप शादी कर लेने की बात कही, पर शैलेन्द्र को यह पसंद नही था। उनको विश्वास था कि कविता के पिता मान जायेंगे। वे घर आये और उन्होंने अपनी माँ को कविता के घर भेजा। माँ ने कविता के पिता को समझाने की बहुत कोशिश की पर कोई फायदा नही हुआ। बेटे के आंसुओं को याद कर माँ बार बार जाती पर हर बार नया बहाना सुन कर वापस लौट आती।
शैलेन्द्र एक अजीब दोराहे पर किंकर्तब्यबिमूढ़ से खड़े थे।  वे सारा प्रयास कर हार गए थे फिर भी कोई उम्मीद नही दिख रही थी। उधर बार बार कविता शादी कर लेने के लिए कहती पर शैलेन्द्र का मन नकार जाता।
धीरे धीरे शैलेन्द्र खुद को कविता से दूर करने लगे। पहले मिलना बन्द हुआ, फिर फोन उठाना बन्द हुआ और कुछ दिनों बाद शैलेन्द्र ने मोबाईल नंबर बदल लिया। कविता का शैलेन्द्र से मिलने या बात करने का हर प्रयास अब विफल हो रहा था और उसे शैलेन्द्र की कोई खबर नही मिल पाती थी।  इस बीच एक दिन उसे शैलेन्द्र के BPSC पास कर शिक्षक बनने का पता चला। उसने शैलेन्द्र से बात कर के बधाई देना चाहा पर उसने मोबाईल नम्बर ही बदल लिया था।
और उसके कुछ ही दिन बाद शैलेन्द्र की शादी तय होने की बात पता चली। अब कविता का धीरज टूट गया था। अगले ही दिन वह सारा लिहाज छोड़ कर शैलेन्द्र के घर पहुच गयी। कविता को देख कर रो उठी शैलेन्द्र की माँ घंटो तक सिसकती रही, पर पत्थर हो चुके शैलेन्द्र ने बस इतना ही कहा- मैं तुम्हारा अपराधी हूँ कविता, मुझे माफ़ कर देना और भूल जाना। डाल से टूट कर मुरझाई हुई कविता प्रेम में हार कर वापस लौट गयी।
तीन साल बीत गए। शैलेन्द्र की शादी हो गयी थी और अब उनका एक बेटा भी था। कविता का प्रेम उनके हृदय में था या नही यह कोई नही जानता पर विवाह के बाद कभी घर में किसी ने उनके मुह से कविता का नाम नही सुना था।

तीन साल से समय की सड़क पर चुपचाप चलते शैलेन्द्र के घर आज कविता की शादी का कार्ड आया था, और आज जाने कैसे उनके कदम उनको फिर गंगा के घाट पर खीच ले गए थे।
आधे घंटे तक चुपचाप मछलियों को आटे की गोलियां खिलाते रहे शैलेन्द्र तिवारी। फिर खड़े हो कर जैसे बुदबुदाने लगे- गंगा मईया, तुम और वह ईश्वर साक्षी है; इस जीवन में सिर्फ और सिर्फ उसी को प्यार कर पाया हूँ। पर क्या करूँ, सबकुछ बर्दाश्त कर सकता था पर उसे बदनाम होते देखना बर्दाश्त नही कर पाता। आज तुम्हारे घाट पर अंतिम प्रार्थना करता हूँ, इस जीवन में मैंने जो भी पूण्य किये हों वह उसे मिल जाय। उसके हिस्से का भी मैं रो चूका हूँ, अब कभी उसके जीवन में दुःख का एक पल भी मत देना भगवान।
कहते कहते शैलेन्द्र की आँखों से दो बून्द आंसू गिरे और युगों से पापियों का पाप धो कर मैली हो चुकी गंगा उन दो आंसुओं में मिल कर पवित्र हो गयी।
सीढ़ियों से ऊपर चढ़ते शैलेन्द्र ने आज आसाढ़ की कृष्ण- नवमी को चार साल बाद फगुआ कढ़ाया-
सगरो चइत बीति गइलें, हो रामा…. पिया नाही अइले..

लेखक / लेखिका : सर्वेश तिवारी श्रीमुख

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