कम्बक्त दिल भी देखो तो

कम्बक़्त दिल भी देखो
तो….
तुम पे ही आना था?
क्या सिर्फ़ तुम ही ज़माने में
मेरे मिजाज़ का दिल रखते हो?
खादी का कुर्ता तो दिल्ली में
कई चालीस पार कर चुके मर्द
डालते होंगे?
पर क्या गाँधी वाली खादी के
धागे केवल तुम्हारे ही पोशाक में
सिले हैं?
यह भावनाएँ भी बड़ी भोली
होती है किसी के पे भी
मर मिटती हैं,
जब देखा किसी के भी
कंधे को शीतल,निर्मल
छाँव मानकर
पन्हा ले लेती हैं
हम्म……
नास्तिक तो पूंजीवादी भी
होते होंगे,पर क्या तुम जैसे
बौद्धिक की सिगरेट नुमा
सिगार पे ही
यह प्रेम रूपी अंकुर फूटना था?
यह प्रश्न न मन की व्यथा है
बस यह मेरा कम्बक़्त सा दिल है
जो…बड़ा एक्टिविस्ट बना फिरता है।
लेखक / लेखिका : सीमा आरिफ़

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