उम्र

आज मुलाकात हुई
जाती हुई उम्र से

मैने कहा जरा ठहरो तो
वह हंसकर इठलाते हुए बोली
मैं उम्र हूँ ठहरती नहीं
पाना चाहते हो मुझको
तो मेरे हर कदम के संग चलो

मैंने मुस्कराते हुए कहा
कैसे चलूं मैं बनकर तेरा हमकदम
संग तेरे चलने पर छोड़ना होगा
मुझको मेरा बचपन
मेरी नादानी, मेरा लड़कपन
तू ही बता दे कैसे समझदारी की
दुनियां अपना लूँ
जहाँ हैं नफरतें, दूरियां,
शिकायतें और अकेलापन

उम्र ने कहा
मैं तो दुनियां ए चमन में
बस एक “मुसाफिर” हूँ
गुजरते वक्त के साथ
इक दिन यूं ही गुजर जाऊँगी
करके कुछ आँखों को नम
कुछ दिलों में यादें बन बस जाऊँगी

लेखक / लेखिका : अंकित रॉय

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