मेरे आँख मे वो मंजर कैसे दिखाई दे।

खुदा के घर से आया हूँ कहो कैसे सफाई दे।

वही मंदिर मे बसता है वही मस्जीद मे बसता है,

जो तेरे खोट है दिल मे तुझे कैसे दिखाई दे।

रगो मे दौङते रहने का मतलब नही साहेब,

जब तक आँख मे न आए लहू कैसे दिखाई दे।

बङी सुन्दर सी थी कल आज लूटी खुद के हाथो से,

फिर सोने की चिङीया सी भारत कैसे दिखाई दे।

अगर सवाल न छेङू तो सब अपाहिज से दिखते है,

जो उनके आग है दिल मे वो कैसे दिखाई दे।

 

ऋषभ पाण्डेय “राज”

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