रिश्ते

ये मेरे बेबसी भी थी

और  मेरा होसला  भी था-

कि तुझे  छोड़कर आगे निकल आया |

कभी गुज़रा जो तेरी

रहगुज़र से फिर…….

एक कसक जाने क्यों उठी

एक धागा जाने क्यों चटका……

क्या होसले से बड़ा था प्यार का रिश्ता?

तुझे क्यों उम्मीद –उम्मीद

में बांधा मैंने

क्यों उकेरा तेरा चेहरा

ज़मी और आसमा में……

मैं तो था तुझसे सारे रिश्ते तोड़ आया

न जाने क्या बचा था

दरमिया जो न टूटा मुझसे |

                                                   – पूनम के कलम से

 

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Poonam Negi

भावनाओं की अभिव्यक्ति मातृभाषा से अधिक किसी भाषा में संभव नही है। दिल के उदगार, भावनाओं के ज्वार, हृदय का प्यार.... आपकी नज़र मेरी कलम का उपहार।

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