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कारक

By |2016-09-19T09:13:38+00:00July 26th, 2016|Categories: व्याकरण|0 Comments

कारक ( Case )

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से उनका (संज्ञा या सर्वनाम का) क्रिया से सम्बन्ध सूचित हो, उसे ‘कारक’ कहते हैं. जैसे-

कारक के भेद

हिंदी में कारक आठ हैं और कारकों के बोध के लिए संज्ञा या सर्वनाम के आगे जो प्रत्यय (चिन्ह) लगाये जाते हैं, उन्हें व्याकरण में ‘विभक्तियाँ’ कहते हैं.

कारक   विभक्तियाँ
कर्त्ता 0, ने
कर्म 0, को
करण से
सम्प्रदान को, के लिए
अपादान से (अलगाव के अर्थ मेँ )
सम्बन्ध का, की, के, रा, री, रे
अधिकरण में, पर
सम्बोधन हे, अहो, अजी, अरे

 

कर्त्ताकारक

वाक्य में जो शब्द काम करनेवाले के अर्थ में आता है,उसे ‘कर्त्ता’ कहते हैं. जैसे – ‘मोहन खाता है’.

कर्मकारक

वाक्य में क्रिया का फल जिस  शब्द पर पड़ता है, उसे कर्म कहते हैं. जैसे – मैंने हरि को बुलाया.

करणकारक

वाक्य में जिस शब्द से क्रिया के सम्बन्ध का बोध हो,उसे करणकारक कहते हैं. जैसे – वह कुल्हाड़ी से वृक्ष काटता है.

सम्प्रदानकारक

जिसके लिए कुछ किया जाये या जिसको कुछ दिया जाये, इसका बोध करानेवाले शब्द के रूप को सम्प्रदानकारक कहते हैं. जैसे – हरी मोहन को मारता है.

अपादानकारक

संज्ञा के जिस रूप से किसी वस्तु के अलग होने का भाव प्रकट होता है,उसे अपादनकारक कहते हैं.जैसे – हिमालय से गंगा निकलती है.

संबंधकारक

संज्ञा या सर्वनाम के जिस रूप से किसी अन्य शब्द के साथ सम्बन्ध या लगाव प्रतीत हो, उसे संबंधकारक कहते हैं.जैसे – राम की किताब, श्याम का घर.

अधिकरणकारक

क्रिया या आधार को सूचित करनेवाली संज्ञा या सर्वनाम के स्वरूप को अधिकरणकारक कहते हैं. जैसे – तुम्हारे घर पर चार आदमी है.

सम्बोधनकारक

संज्ञा के जिस रूप से किसी के पुकारने या संकेत करने का भाव पाया जाता है, उसे सम्बोधनकारक कहते हैं. जैसे – हे भगवान !

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