वाक्य

मनुष्य के विचारों को पूर्णता से प्रकट करनेवाले  पदसमूह को वाक्य कहते हैं।

वाक्य में आकांक्षा, योग्यता और काम

वाक्य  के एक पद को  सुनकर दूसरे पद को सुनने या जानने की जो स्वाभाविक उत्कंठा जागती है, उसे आकांक्षा कहते हैं ।जब वाक्य का प्रत्येक पद या शब्द अर्थबोधन में सहायक हो, तो समझना चाहिए की वाक्य में योग्यता वर्तमान है । वाक्यों में प्रयुक्त पदों या शब्दों की विधिवत स्थापना को क्रम  कहते हैं।

रचना की दृष्टि से वर्गीकरण :- 

सरल वाक्य

जिस वाक्य में एक क्रिया होती है और एक कर्ता होता है, उसे साधारण या सरल वाक्य कहते हैं। इसमें एक उद्देश्य और एक विधेय रहते हैं । जैसे – बिजली चमकती है, पानी बरसा इत्यादि ।

 मिश्र वाक्य

जिस वाक्य में एक साधारण वाक्य के अतिरिक्त उसके अधीन कोई दूसरा अंगवाक्य हो, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं। दूसरे शब्दों में, जिस वाक्य में मुख्य उद्देश्य और मुख्य विधेय के अलावा एक या अधिक  समापिका क्रियाएँ हों, उसे मिश्र वाक्य कहते हैं । जैसे – वह कौन – सा मनुष्य है, जिसने महाप्रतापी राजा भोज का नाम न सुना हो।

संयुक्त वाक्य

संयुक्त वाक्य उस वाक्य – समूह को कहते हैं, जिसमे दो या दो अधिक सरल वाक्य अथवा मिश्र वाक्य अव्ययों द्वारा संयक्त हो। इस प्रकार के वाक्य लम्बे और आपस में उलझे होते हैं। जैसे – मैं रोटी खाकर लेटा कि पेट में दर्द होने लगा, और दर्द इतना बढ़ा की तुरंत डॉक्टर को बुलाना पड़ा।

अर्थ की दृष्टि से वर्गीकरण :-

अर्थ के अनुसार वाक्य के आठ भेद है।

  • प्रश्नवाचक वाक्य– जिससे किसी प्रकार के प्रश्न किये जाने का बोध हो। जैसे – क्या तुम खा रहे हो ? तुम्हारा नाम क्या है?
  • आज्ञावाचक वाक्य– जिससे किसी तरह की आज्ञा का बोध हो। जैसे – तुम खाओ। तुम पढ़ो।
  • निषेधवाचक वाक्य– जिससे किसी बात के न होने का बोध हो । जैसे – सरल वाक्य – हमने खाना नहीं खाया। मिश्र  वाक्य – मैंने खाना नहीं खाया, इसलिए मैंने फल नहीं खाया । संयुक्त  वाक्य – मैंने भोजन नहीं किया और इसलिए मेरी भूख नहीं मिटी।
  • विधिवाचक वाक्य– जिससे किसी बात के होने का बोध हो । जैसे – सरल वाक्यहम खा चुके । मिश्र वाक्य– मैं खाना खा चूका, तब वह आया। संयुक्त वाक्य – मैंने खाना खाया और मेरी  भूख  मिट गयी।
  • विस्मयवाचक वाक्य– जिससे आश्चर्य, दुःख या सुख    का बोध हो। जैसे  – ओह! मेरा सर फटा जा रहा है।
  • सन्देहवाचक वाक्य– जिससे किसी बात का संदेह प्रकट हो। जैसे – उसने खा लिया होगा। मैंने कहा होगा।
  • इच्छावाचक वाक्य– जिससे किसी प्रकार की इच्छा या शुभकामना का बोध हो। जैसे तुम अपने कार्य में सफल रहो।
  • संकेतवाचक वाक्य– जहाँ एक वाक्य दूसरे की संभावना पर निर्भर हो। जैसे- पानी न बरसता तो धान सुख जाता। यदि तुम  खाओ तो मैं भी खाऊँ।

वाक्य रचना के कुछ सामान्य नियम

वाक्य को सुव्यवस्थित और संयत रूप देने को व्याकरण में पदक्रम कहते हैं। निर्दोष वाक्य लिखने के कुछ नियम है। इनकी सहायता से शुद्ध वाक्य लिखने का प्रयास किया जा सकता है। सुन्दर वाक्यों की रचना के लिए () क्रम () अन्वय और ()प्रयोग से सम्बन्ध कुछ सामान्य नियमों का ज्ञान आवश्यक है।

क्रम

किसी वाक्य के सार्थक शब्दों को यथास्थान रखने की क्रिया को क्रम अथवा पदक्रम कहते हैं। इसके कुछ सामान्य नियम इस प्रकार हैं।

  1. हिंदी वाक्य के आरम्भ में कर्त्ता , मध्य में क्रम और अंत में क्रिया होनी चाहिए। जैसे – मोहन ने भोजन किया।यहाँ कर्त्ता मोहन कर्म भोजन और अंत में क्रिया है
  2. उदेश्य या कर्त्ता के विस्तार को कर्त्ता के पहले और विधेय या क्रिया के विस्तार को विधेय के पहले रखना चाहिए। जैसे – अच्छे लड़के धीर – धीरे पढ़ते हैं।
  3. कर्त्ता और कर्म के बीच अधिकरण, अपादान, सम्प्रदान और करण कारक क्रमशः आते हैं। जैसे – मुरारी ने घर में (अधिकरण) आलमारी से (अपादान) श्याम के लिए (सम्प्रदान) हाथ से (करण) पुस्तक निकाली।
  4. सम्बोधन आरम्भ में आता है। जैसे – हे प्रभु, मुझपर दया करें।
  5. विशेषण विशेष्य या संज्ञा के पहले आता है। जैसे- मेरी उजली कमीज कहीं खो गयी।
  6. क्रिया विशेषण क्रिया के पहले आता है। जैसे – वह तेज दौड़ता है।
  7. प्रश्न वाचक पद या शब्द उसी संज्ञा के पहले रखा जाता हैं, जिसके बारे में कुछ पूछा जाये। जैसे – क्या मोहन सो रहा है ?

टिप्पणी – यदि संस्कृत की तरह हिंदी में वाक्यरचना के साधारण क्रम का पालन न किया जाये, तो इससे कोई क्षति अथवा अशुद्धि नहीं होती। फिर भी, उसमे विचारों का एक तार्किक क्रम ऐसा होता है, जो एक विशेष रीति के अनुसार एक – दुसरे के पीछे आता है।

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